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Wednesday, September 26 2018
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संत्तान गोपाल मंत्र पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल

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सन्तान गौपाल मंत्र 

                                                               मनुष्य पर तीन ऋण जन्म के समय से ही रहते है | देव ऋण, ऋषि ऋण,पितृ ऋण। पितृ ऋण से मनुष्य तभी उऋण हो सकता है, जब वंश वृद्धी के लिए , सुयोग्य संतान उत्तपन्न कर ले | पुत्र पुन्नाम नामक नरक से पिता की रक्षा करता है, इसलिए ब्रह्मा ने इसे पुत्र की संज्ञा दी हैं । श्रुतीस्मृति पुराणों में भी पुत्र का महत्व बताया है। सभी लोगों की अन्तर्मन की यह अभिलाषा रहती है कि उसके आँगन में भी कोई बाल गोपाल खेले | कई स्त्रियाँ इस मातृ सुख से लम्बेकाल तक वंचित रहती है | जिसके कई कारण है, यथा पति पत्नि मे कोई शारीरिक कमी, ज्योतिष के अनुसार कोई बंध्या योग आदि,देव पितृ दोष तथा संजोग। धर्म शास्त्रों ने पुत्र अभिलाषा की पुर्ति के लिये कई व्रत, अनुष्ठान,जप आदि बताये गये है ज्योतिष शास्त्र ने भी ग्रह यंत्र, रत्न धारण आदि उपाय सुझाये है |  औषधी विज्ञान ने भी बहुत सी अनूभुत औषधी जो प्रकृति प्रदत्त है, इस कार्य के लिए निर्धारित की है। शास्त्रो के अनुसार संतान प्राप्ति के लिये हरिवंश पुराण, संतान गोपाल मंत्र, शतचंडी का विधान, पार्थिव शिवपुजन, महारुद्रप्रयोग, सपात्र पितृश्राद्ध, पितृ स्तोत्रका पाठ आदि कई उपाय बताये है | इसमे सर्वाधिक सरल उपाय संतान गौपाल मंत्र का जाप और दशांश हवन आदि कर्म है |

यह मंत्र सुबह स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र पहन कर एक पाटे पर बालगौपाल स्वरुप कृष्ण की तस्वीर या मुर्ति लाल वस्त्र बिछाकर रखे | पूर्वाभिमुख बैठकर , अपने दायी तरफ दिपक प्रज्वलित करे |  भगवान को पहले स्नान कराये | उसके बाद चन्दन , अक्षत, पुष्प, तुलसी पत्र, धूप, दीप , नैवैध आदि से उनकी पूजा करें उसके बाद एकाग्रचित से मंत्र का जप करें | जप के बाद , जप श्री कृष्ण भगवान को ही अर्पण करे | खुद भी प्रसाद लेवें जप कार्य पूर्ण होने पर दशांश हवन भी करे | जप के समय हमेशा याचक भाव बनाये रखें |

कुछ ध्यान देने योग्य बातेः

जप, अनुष्ठान आदि में आसन की शुद्धि परम आवश्यक है । आसन कुश यानी डाब या ऊनका हो तो अति उत्तम है । मंत्र जप के समय अथवा मन को एकाग्र करते समय, शरीर के अन्दर एक प्रकार की विद्युत शक्ति उत्पन्न होती है, जो शरीर मन को स्वस्थ बनाती है । यदि शरीर और पृथ्वी के बीच कोई अच्छा आसन हो तो वह विद्युत शक्ति  पृथ्वी  के आकर्षण से खींच कर पृथ्वि में समा जाती है। अतः अच्छे आसन का चयन करे और उस आसन का अन्यत्र उपयोग नही करे मंत्र उच्चारण के समय नस नाडीयों का और शरीर के सुक्ष्म अवयवों अंगो का परस्पर आघात प्रत्याघात होता है। मंत्र जप के समय सीधा बैठे, रीढ की हड्डी सीधी रहनी चाहिए  । जप समय मे पैर के तलुवौ का,गुह्म स्थानो का स्पर्श निषिध्द है   

जप या पुजा के समय छिंक जाये तो दाहिने कान का स्पर्श करके, हाथ धोकर बाकी कार्य पहले की भाँति ही सम्पादित करे। जप सिद्धी के लिए,मन मे संतोष,विश्वास, एकाग्रता,मोन भाव और मंत्र के अर्थ का विचार करना चाहीए मन में खिन्नता या उद्वेग होवे । मंत्र जप की गिनती अवश्य रखनी चहिये, क्योंकि बिना संख्या का जप आसुर जप कहलाता है किंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा सिर्फ मंत्र जप के विषय में ही है । प्रतिक्षण भगवान के नाम स्मरण एवं नाम किर्तन में यह अनिवार्य नही है जप के लिए तुलसी की माला या चंदन की माला श्रेष्ठ है। प्रत्येक मंत्र के पहले जपे माला के सुमेरु को लाँघे नही बल्की १०८ जप होने के पश्चात माला को घुमा कर वापस जप प्रारम्भ करे। जप के समय में तर्जनी अंगुली का स्पर्श होने दे, जप मध्यमा और अंगुठे से ही करे माला को जप करते समय में गोमुखी में ही रखे । भगवान को अपने घर में दुध से निकाला हुआ मक्खन मिश्रीका भोग लगाये और खुद भी प्रसाद ग्रहकरे । जप श्चा आसन से खड़े होने से पहले आसन के नीचे की मिट्टी मस्तक पर लगाये, अन्यथा जप निष्फल हो जाता है जप का फल इंद्र को जाता है । जन्म मरण सुतक में जप नही करना चाहिए, मासिक धर्म के दिन तक भी स्त्रियों को पुजा,जप आदि कार्य नही करना चाहिए। जप के समय भगवान के प्रति स्वयं का याचक भाव ही रखना चाहिए। मन में अपनी मनोकामना का ही चिंतन रखे और भगवान मे अटुट श्रद्धा और विश्वास रखे कि प्रभु मेरी मनोअभिलाषा अवश्य ही पुर्ण करेगे ।

 

संत्तान गोपाल मंत्र संकल्प

म् पूत्र कामना सिद्धर्थमु चतूर्विध बंध्यात्व दोष परिहार अर्थमु

सवादु लक्ष संतान गौपाल मंत्र संख्या परिपूर्त्तये अमूक संख्यात्मकं मंत्र जप करिष्यें  ||

ः संकल्प का जल कोई पात्र में छोडेः

विनियोग ;

                       अस्य श्री संतान गौपाल मंत्रस्य श्री नारद ऋषिः। अनूष्ठप छन्दः।

                  श्री कृष्ण देवताः। ग्लौं बीजम् । नमः शक्तिः। पूत्रार्थे जपे विनियोगः।

                                                   चम्मच का जल कोई पात्र में छोडे

          अंगन्यास                                                      न्यास

देवकी सुत गोविंद  ह्रदयाय नमः।              देवकी सुत गोविंद  अंगुष्ठाभ्यां नमः।

वासुदेव जगत्पते शिर से स्वाहा।               वासुदेव जगत्पते तर्जनीभ्यां नमः।

देहिमे तनयं कृष्ण शिखायै वषट् |         देहिमे तनयं कृष्ण मध्यमाभ्यां नमः।

त्वामहं शरणं गतःकवचाय हुम् ।         त्वामहं शरणं गतः अनामिकाभ्यां नमः। 

ॐ देवकीसुत गोविन्द,                                  ॐ देवकीसुत गोविन्द,

वासुदेव जगत्पते नैत्रत्रयाय वौषट्।          वासुदेव जगत्पते कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

देहिमे तनयं कृष्ण   ,                                              देहिमे तनयं कृष्ण , 

त्वामहं शरणं गतः अस्त्राय फट्          त्वामहं शरणं गतः करतल पृष्ठाभ्यां नमः। 

 

                          |  संतान गौपाल मंत्र |

                                             ॐ देवकीसूत गोविन्द , वासुदेव जगत्पते।

                                   देहिमे तनयं कृष्ण , त्वामहं शरणं गतः।।

अनुष्ठान पुर्ण होने पर दशांश हवन, ब्राह्मण भोजन आदि कराना चाहिए। मनोकामना सिद्ध होने पर किसी ब्राह्मण को गोदान स्वर्ण दान आदि देकर , प्रभु का आभार व्यक्त करना चाहिए। चंद्रमा पंचम भाव मे हो, किसी    क्रूर ग्रह ही दृष्टि पंचम भाव पर नहीं पड रही हो, तब सवा लाख जप प्रारम्भ करे।
 
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