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Wednesday, August 16 2017
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तुम बसी हो कण कण अंदर पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल

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"Play Sound" (Mini-MP3-Player 1.2 ©Ute Jacobi)

तुम बसी हो कण कण अंदर , माँ हम ढुढंते रह गये मंदिर में |

हम मूढमति हम अज्ञानी , माँ सार तुम्हारा क्या जाने ||

 

तेरी माया को ना जान सके , तुझको ना कभी पहचान सके |

हम मोह की निंद्रा सोये रहे , माँ इधर उधर ही खोये रहे |

तु सुरज तु ही चंद्रमा , हम ढुढंते रह गये मंदिर में || तुम बसी हो कण कण अंदर

 

हर जगह तुम्हारे डेरे माँ , कोइ खेल ना जाने तेरे माँ |

इन नैनों को ना पता चले , किस रुप में तेरी ज्योत जगे |

तु परवत तु ही समंदर माँ , हम ढुढंते रह गये मंदिर में || तुम बसी हो कण कण अंदर

 

कोइ कहता तुम्ही पवन में हो ,  और तुम्ही ज्वाला अगन में हो |

कहते है अंबर और जमी , तुम सब कुछ हो हम कुछ भी नहीं

फल फुल तुम्ही तरुवर माँ , हम ढुढंते रह गये मंदिर में || तुम बसी हो कण कण अंदर

 

तुम बसी हो कण कण अंदर , माँ हम ढुढंते रह गये मंदिर में |

हम मूढमति हम अज्ञानी , माँ सार तुम्हारा क्या जाने ||

 

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