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Saturday, October 21 2017
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कभी फुर्सत हो तो जगदम्बें पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल

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"Play Sound" (Mini-MP3-Player 1.2 ©Ute Jacobi)

कभी फुर्सत हो तो जगदम्बें , निर्धन के घर भी आजा ना |

कभी फुर्सत हो तो जगदम्बें , निर्धन के घर भी आजा ना |

जो रुखा सूखा दिया हमें, कभी उसका भोग लगा जाना ||

 

ना छत्र बना सका सोने का, ना चुनरी घर में रे तारो जडी |

ना पेडे बर्फी मेवा हैं माँ, बस श्रद्धा है नैन बिछाये खडी |

इस श्रद्धा की रख लो लाज हे माँ, इस अर्जी को ना ठुकरा जाना || जो रुखा सूखा दिया हमें......

 

जिस घर के दिये में तेल नहीं, वहाँ ज्योत जलाऊ मैं कैसे |

मेरा खुद ही बिछौना धरती पर, तेरी चौकी सजाऊ मैं कैसे |

जहाँ मै बैठा वही बैठ के माँ, बच्चों का दिल बहला जाना || जो रुखा सूखा दिया हमें......

 

तु भाग्य बनाने वाली है, माँ मैं तकदीर का मारा हूँ |

हे दाती संभालो को भिखारी को, आखिर तेरी आखँ का तारा हूँ |

मैं दोषी तु निर्दोष हैं माँ, मेरे दोषो को तु भुला जाना || जो रुखा सूखा दिया हमें......

 

कभी फुर्सत हो तो जगदम्बें , निर्धन के घर भी आजा ना |

जो रुखा सूखा दिया हमें, कभी उसका भोग लगा जाना ||

 
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