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Tuesday, July 17 2018
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भद्रा विचार पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल

भद्रा विचार......

 

                                                           पुर्व काल में देव दानव युद्ध में शिव शंकर के देह से यह भद्रा उत्पन्न हुई हैं | दैत्यों को मारने के लिये गर्दभ (धा) के मुख और लंबे पुछँ सहित और तीन पैर युक्त उत्पन्न हुई है। सिंह जैसी मुर्दे पर चढी हुई सात हाथ और शुष्क पेटवाली महाभयंकर, विकराल मुखी, कार्य का नाश करने वाली, अग्नि, ज्वाला सहित देवों की भेजी हुई पृथ्वी पर उतरी है। तः शु कार्यों में भद्रा त्यागना ही सर्वश्रेष्ठ है |

              भद्रा का दुसरा नाम विष्टी करण हैं कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी और शूक्ल पक्ष की चतुर्थी एकादशी के उत्तरार्ध में एवं कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी, शुक्लपक्ष की अष्टमी, पुर्णिमा के पुर्वार्ध में भद्रा रहती है जिस भद्रा के समय चँद्रमा मेष,वृष, मिथुन, वृश्चिक राशि में हो तो भद्रा निवास स्वर्ग में रहता है । चंद्रमा कन्या,तुला, धनु, मकर राशि में हो तो भद्रा पाताल में वास करती हैं और कर्क,सिंह, कुंभ,मीन राशी का चंद्रमा हो तो भुमी का निवास रहता है। शास्त्रों के अनुसार भुमी की भद्रा ही अशुभ मानी जाती है। तिथी के पुर्वार्ध में (कृष्णपक्ष की .१४ और शुक्लपक्ष की .१५ तिथी दिन की भद्रा कहलाती है तिथी के उत्तरार्ध की (कृष्णपक्ष की . १० और शुक्लपक्ष की .११ ) की भद्रा रात्री की भद्रा कहलाती है। यदि दिन की भद्रा रात्री के समय और रात्री की भद्रा दिन के समय जाये तो उसे आचार्यो ने शुभ माना है अति आवश्यक कार्य जाए तो भद्रा की प्रारम्भ की टी जो भद्रा का मुख होती है, अवश्य ही त्यागनी चाहिए। श्रेष्ठ तो यही है की भद्रा को त्याग कर ही मांगलीक कार्य सम्पन्न करने चाहिए।
भद्रा का दुसरा नाम विष्टी करण हैं कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी और शूक्ल पक्ष की चतुर्थी एकादशी के उत्तरार्ध में एवं कृष्णपक्ष की सप्तमी, चतुर्दशी, शुक्लपक्ष की अष्टमी, पुर्णिमा के पुर्वार्ध में भद्रा रहती है जिस भद्रा के समय चँद्रमा मेष,वृष, मिथुन, वृश्चिक राशि में हो तो भद्रा निवास स्वर्ग में रहता है । चंद्रमा कन्या,तुला, धनु, मकर राशि में हो तो भद्रा पाताल में वास करती हैं और कर्क,सिंह, कुंभ,मीन राशी का चंद्रमा हो तो भुमी का निवास रहता है। शास्त्रों के अनुसार भुमी की भद्रा ही अशुभ मानी जाती है। तिथी के पुर्वार्ध में (कृष्णपक्ष की .१४ और शुक्लपक्ष की .१५ तिथी दिन की भद्रा कहलाती है तिथी के उत्तरार्ध की (कृष्णपक्ष की . १० और शुक्लपक्ष की .११ ) की भद्रा रात्री की भद्रा कहलाती है। यदि दिन की भद्रा रात्री के समय और रात्री की भद्रा दिन के समय जाये तो उसे आचार्यो ने शुभ माना है अति आवश्यक कार्य जाए तो भद्रा की प्रारम्भ की टी जो भद्रा का मुख होती है, अवश्य ही त्यागनी चाहिए। श्रेष्ठ तो यही है की भद्रा को त्याग कर ही मांगलीक कार्य सम्पन्न करने चाहिए।
 
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