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Wednesday, August 16 2017
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|| शुक्र-ग्रह व्रत कथा || पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल

  

माणिकपुर नगर में कायस्थ, ब्राह्मण और वैश्य पुत्रों में गहरी मित्रता थी। वे अधिकतर साथ रहते थे। साथ ही भोजन करते थे और घंटो बैठकर बातें करते थे। तीनों को विवाह हो चुका था। ब्राह्मण और कायस्थ के लड़कों का गौना हो चुका था, लेकिन वैश्यपुत्र का गौना अभी नहीं हुआ था। उसके दोस्तों ने एक दिन वैश्यपुत्र से कहा, अरे यार! तुम्हारे घर में नौकर-चाकर हैं। धन के भण्डार हैं, लेकिन तुम्हारी पत्नी के बिना घर सूना-सूना-सा लगता है। तुम अपनी ससुराल जाकर अपनी पत्नी को ले क्यों नहीं आते? दोनों मित्रों के कहने पर वैश्यपुत्र धनराज ने अपनी पत्नी कुसुम को लाने का निश्चय कर लिया।
अगले दिन धनराज ने अपने माता-पिता से कहा कि वह कुसुम को लेने ससुराल जा रहा है। उसकी बात सुनकर माता-पिता हैरान होते हुए बोले, बेटे! अभी शुक्र अस्त हो रहा है। इसलिए अभी कुसुम को लाना उचित नहीं है। कुछ दिन ठहर जा। लेकिन धनराज अपनी जिद पर अड़ा हुआ था। वह नहीं माना। धनराज ससुराल पहुंचा तो उसके सास-ससुर ने बहुत जोर-शोर से उसका स्वागत किया। धनराज की खूब आवभगत की गई। धनराज ने कुसुम को विदा करने के लिए कहा तो उसके सास-ससुर ने कहा, बेटे! अभी शुक्र अस्त हो रहा है। ऐसे समय लड़की को विदा नहीं करते। कुछ दिन ठहर जाओ। फिर हम खुशी-खुशी विदा कर देंगे। धनराज ने उसी दिन विदा करने की जिद की तो सबने धनराज को समझाया, लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी। आखिर हारकर सास-ससुर को कुसुम को विदा करना पड़ा।
अपनी पत्नी कुसुम को विदा कराकर धनराज अपने घर के लिए चल पड़ा। रथ में लौटते हुए अचानक बैलों को न जाने क्या हुआ कि वे आगे की ओर तेजी से दौड़ पड़े। रास्ते में पड़े पत्थर से टकराने के कारण रथ का पहिया टूट गया। नीचे गिरने से कुसुम को चोट लगी। दोनों को आगे की यात्रा पैदल ही करनी पड़ी। सुनसान रास्ते से गुजरते हुए डाकुओं ने उन्हें लूट लिया। उनका सारा धन, आभूषण और वस्त्र तक छीन लिए। किसी तरह मरते-गिरते दोनों घर पहुंचे। घर में आराम करते हुए धनराज के बिस्तर पर एक सांप चढ़ गया और उसने धनराज को काट लिया। सेठजी ने बड़े-बड़े चिकित्सक बुलाकर सांप का विष नष्ट करने को कहा, लेकिन कोई चिकित्सक सफल नहीं हुआ। दूर-दूर से संपेरे बुलाए गए, लेकिन कोई भी धनराज को नहीं बचा सका। धनराज की मृत्यु हो गई। तब पण्डितों ने सेठ से कहा, सेठजी! आपके बेटे ने शुक्र अस्त होने पर बहू को विदा करा लाने की भूल की है। यदि आप शुक्रवार की पूजा-अर्चना करें और बेटे की बहू शुक्रवार का व्रत करे तथा कथा सुनकर प्रसाद ग्रहण करे तो शुक्रदेवता की अनुकम्पा से धनराज पुनः जीवित हो सकता है।
सेठजी ने पण्डितों की बात मानकर अपने मृत बेटे और बहू को वापस भेज दिया। कुसुम ने अपने घर पहुंचकर शुक्रवार का व्रत और पूजा-पाठ किया। उसने अपने पति की गलती के लिए शुक्र देवता से क्षमा मांगी। तभी धनराज उठ बैठा। धनराज के जीवित हो जाने से घर भर में खुशियां भर गईं। उधर धनराज के माता-पिता ने बेटे के जीवित होने का समाचार सुना तो शुक्रवार का व्रत किया और गरीबों को अन्न, वस्त्र और धन का दान दिया। शुक्र के उदय हो जाने पर धनराज अपनी पत्नी कुसुम के साथ घर लौट आया। दोनों पति-पत्नी शुक्रवार का विधिवत व्रत करते हुए शुक्र की पूजा करने लगे। उन के घर में धन-धान्य की वर्षा होने लगी। उनके सभी कष्ट दूर होते चले गए। परिवार में सभी आनन्दपूर्वक रहने लगे।

 
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