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Tuesday, August 22 2017
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ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अपरा एकादशी पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल

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व्रत कथा:

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि अपरा एकादशी पुण्य प्रदाता और बड़े-बड़े पातकों का नाश करने वाली है। ब्रह्मा हत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करने वाला, गर्भस्थ शिशु को मारने वाला, परनिंदक, परस्त्रीगामी भी अपरा एकादशी का व्रत रखने से पापमुक्त होकर श्री विष्णु लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है। माघ में सूर्य के मकर राशि में होने पर प्रयाग में स्नान, शिवरात्रि में काशी में रहकर व्रत, गया में पिंडदान, वृष राशि में गोदावरी में स्नान, बद्रिकाश्रम में भगवान केदार के दर्शन या सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान और दान के बराबर जो फल मिलता है, वह अपरा एकादशी के मात्र एक व्रत से मिल जाता है। अपरा एकादशी को उपवास करके भगवान वामन की पूजा से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। इसकी कथा सुनने और पढ़ने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।

युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन्! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है तथा उसका माहात्म्य क्या है सो आप कृपा कर ‍बताएँ। श्रीकृष्ण भगवान कहने लगे कि राजन् इस एकादशी का नाम अपरा एकादशी है, क्योंकि यह अपार धन देने वाली है। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, वे संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं।

अपरा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, भूत योनि, दूसरे की निंदा, आदि सब पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या बनाना, झूठा ज्योतिषी बनना तथा झूठा वैद्य बनना आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं। जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाएँ वे नरकगामी होते हैं, परंतु अपरा एकादशी व्रत करने से वे भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

जो शिष्य गुरु से विद्या ग्रहण करते हैं और फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं, मगर अपरा एकादशी का व्रत करने से वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं। जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तट पर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त होता है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर के सूर्य में प्रयाग राज के स्नान से, कुंभ में केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान से, स्वर्ण अथवा हाथी-घोड़ा दान करने से, यज्ञ में स्वर्ण दान करने से अथवा अर्ध प्रसूत गौ दान से जो फल मिलता है वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है।

यह व्रत पाप रूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि, पापरूपी अँधेरे के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्यों को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर विष्णु लोक को जाता है।

प्राचीन काल मे महीधव्ज नामक धर्मात्मा राजा राज्य करता था विधि की विडबना देखिये कि उसी का छोटा भाई वज्रध्वज बडा ही क्रूर, अधर्मी था वह अपने बडे भाई को अपना बैरी समझता था उसने एक दिन अवसर पाकर अपने बडे भाई राजा महीध्वज ही हत्या कर दी और उसके मृत शरीर को जंगल में पीपल के पेड के नीचे गाड दिया ।
राजा की आत्मा पीपल पर वास करने लगी और आने जाने वाले सताने लगी। अकस्मात् एक दिन धौम्य ऋषि उधर से निकले। उन्होने तपोबल से प्रेत के उत्पात का कारण तथा उसके जीवन वृतांत को समझ लिया । ऋषि महोदय ने प्रसन्न होकर प्रेत को पीपल के वृक्ष से उतारकर परलोक विद्या का उपदेश दिया अंत मे ऋषि ने प्रेत योनि से मुक्ति पाने के लिए ”अचला“ एकादशी व्रत करने को कहा
अपरा एकादशी व्रत करने से राजा दिव्य शरीर धारण कर स्वर्गलोक को चला गया हे राजन्! यह अपरा एकादशी की कथा मैंने लोकहित के लिए कही है, इसको पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

 
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