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Monday, October 23 2017
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ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्वराम्यह-मादित्यैरुत विश्वदेवैः ।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यह-मिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ।। १।।

अहं सोममाहनसं बिभम्र्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम् ।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ।। २।।

अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।
तां भा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ।। ३।।

मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् ।
अमन्तवो मां त उपक्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि ।। ४।।

अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः ।
यं कामये तं तमुग्रं कृष्णोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ।। ५।।

अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ ।
अहं जनाय समदं कृष्णोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश ।। ६।।

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ।
ततो वि तिष्टे भुवनानु विश्वो-तामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ।। ७।।

अहमेव वात इव प्र वाम्या-रभमाणा भुवनानि विश्वा ।
परो दिवा पर एना पृथिव्यै-तावती महिना सं बभूव ।। ८।।

।। इति ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तं समाप्तम् ।।

 
  
 

 
 

 
 
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