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Wednesday, August 16 2017
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श्रीगनेणाय नम:। नारद उवाच। प्रणम्यं शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्त्या व्यासं: स्मरोनित्यमायु:कामार्थसिद्धये।।1।।

प्रथमं वक्रतुण्डंच एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णं पिङा्‍गक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।2।।
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम् ।।3।।
नवमं भलाचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्।।4।।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्य य: षठेन्नर:।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वासिद्धिकरं प्रभो।।5।।
विद्यार्थी लभते विद्या धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिन् ।।6।।
जपेदू गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ।।7।।
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।।8।।
इति श्रीनारपुराणें संकटनाशनस्तोत्रं संपूर्णम्।

 
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