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Monday, December 11 2017
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न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।

न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥1॥


भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः

पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।

कुसंसार-पाश-प्रबद्धः सदाऽहं

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥2॥


न जानामि दानं न च ध्यान-योगं

न जानामि तंत्र न च स्तोत्र-मन्त्रम्‌।

न जानामि पूजां न च न्यासयोगं

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥3॥


न जानामि पुण्यं न जानानि तीर्थं

न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्‌।

न जानामि भक्ति व्रतं वाऽपि मात-

र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥4॥


कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धि कुदासः

कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।

कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबंधः सदाऽह

गतिस्त्व गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥5॥


प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं

दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्‌।

न जानामि चाऽन्यत्‌ सदाऽहं शरण्ये

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥6॥


विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे

जले चाऽनले पर्वते शत्रुमध्ये।

अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥7॥


अनाथो दरिद्रो जरा-रोगयुक्तो

महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।

विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाऽहं

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥8॥


॥ इति श्रीमच्छशंकराचार्यकृतं भवान्यष्टकं संपूर्णम्‌ ॥

 
 
 

 
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