मुख्य पृष्ट arrow अन्य जानकारी arrow श्री रामचरित मानस-अयोध्याकाण्ड ०२
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Wednesday, November 14 2018
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श्री रामचरित मानस-अयोध्याकाण्ड ०२ पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल

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केवट कीन्हि बहुत सेवकाई, सो जामिनि सिंगरौर गवाँई ||
होत प्रात बट छीरु मगावा, जटा मुकुट निज सीस बनावा ||
राम सखाँ तब नाव मगाई, प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई ||
लखन बान धनु धरे बनाई, आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई ||
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा, बोले मधुर बचन धरि धीरा ||
तात प्रनामु तात सन कहेहु, बार बार पद पंकज गहेहू ||
करबि पायँ परि बिनय बहोरी, तात करिअ जनि चिंता मोरी ||
बन मग मंगल कुसल हमारें, कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें ||

छं -तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं, 
प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं ||
जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी, 
तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी ||

सो -गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि, 
करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति ||१५१ ||

पुरजन परिजन सकल निहोरी, तात सुनाएहु बिनती मोरी ||
सोइ सब भाँति मोर हितकारी, जातें रह नरनाहु सुखारी ||

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे, सेवा जोगु न भाग हमारे ||
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई, ईधनु पात किरात मिताई ||
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई, लेहि न बासन बसन चोराई ||
हम जड़ जीव जीव गन घाती, कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ||
पाप करत निसि बासर जाहीं, नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं ||
सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ, यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ ||
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे, मिटे दुसह दुख दोष हमारे ||
बचन सुनत पुरजन अनुरागे, तिन्ह के भाग सराहन लागे ||

छं -लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं, 
बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं ||
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा, 
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा ||

सो -बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब, 
जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम ||२५१ ||

चौ॰-पुर जन नारि मगन अति प्रीती, बासर जाहिं पलक सम बीती ||
सीय सासु प्रति बेष बनाई, सादर करइ सरिस सेवकाई ||
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ, माया सब सिय माया माहूँ ||
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं, तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं ||
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई, कुटिल रानि पछितानि अघाई ||
अवनि जमहि जाचति कैकेई, महि न बीचु बिधि मीचु न देई ||
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं, राम बिमुख थलु नरक न लहहीं ||
यहु संसउ सब के मन माहीं, राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं ||

दो -निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच, 
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच ||२५२ ||

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली, ईति भीति जस पाकत साली ||
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू, मोहि अवकलत उपाउ न एकू ||
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी, मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी ||
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ, राम जननि हठ करबि कि काऊ ||
मोहि अनुचर कर केतिक बाता, तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ||
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू, हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ||
एकउ जुगुति न मन ठहरानी, सोचत भरतहि रैनि बिहानी ||
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई, बैठत पठए रिषयँ बोलाई ||

दो -गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ, 
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ||२५३ ||

बोले मुनिबरु समय समाना, सुनहु सभासद भरत सुजाना ||
धरम धुरीन भानुकुल भानू, राजा रामु स्वबस भगवानू ||
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू, राम जनमु जग मंगल हेतू ||
गुर पितु मातु बचन अनुसारी, खल दलु दलन देव हितकारी ||
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु, कोउ न राम सम जान जथारथु ||
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला, माया जीव करम कुलि काला ||
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई, जोग सिद्धि निगमागम गाई ||
करि बिचार जिँयँ देखहु नीकें, राम रजाइ सीस सबही कें ||

दो -राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ, 
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ ||२५४ ||

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू, मंगल मोद मूल मग एकू ||
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ, कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ ||
सब सादर सुनि मुनिबर बानी, नय परमारथ स्वारथ सानी ||
उतरु न आव लोग भए भोरे, तब सिरु नाइ भरत कर जोरे ||
भानुबंस भए भूप घनेरे, अधिक एक तें एक बड़ेरे ||
जनमु हेतु सब कहँ पितु माता, करम सुभासुभ देइ बिधाता ||
दलि दुख सजइ सकल कल्याना, अस असीस राउरि जगु जाना ||
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी, सकइ को टारि टेक जो टेकी ||

दो -बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु, 
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु ||२५५ ||

तात बात फुरि राम कृपाहीं, राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ||
सकुचउँ तात कहत एक बाता, अरध तजहिं बुध सरबस जाता ||
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई, फेरिअहिं लखन सीय रघुराई ||
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता, भे प्रमोद परिपूरन गाता ||
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा, जनु जिय राउ रामु भए राजा ||
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी, सम दुख सुख सब रोवहिं रानी ||
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे, फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे ||
कानन करउँ जनम भरि बासू, एहिं तें अधिक न मोर सुपासू ||

दो -अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान, 
जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान ||२५६ ||

भरत बचन सुनि देखि सनेहू, सभा सहित मुनि भए बिदेहू ||
भरत महा महिमा जलरासी, मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी ||
गा चह पार जतनु हियँ हेरा, पावति नाव न बोहितु बेरा ||
औरु करिहि को भरत बड़ाई, सरसी सीपि कि सिंधु समाई ||
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए, सहित समाज राम पहिँ आए ||
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु, बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु ||
बोले मुनिबरु बचन बिचारी, देस काल अवसर अनुहारी ||
सुनहु राम सरबग्य सुजाना, धरम नीति गुन ग्यान निधाना ||

दो -सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ, 
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ ||२५७ ||

आरत कहहिं बिचारि न काऊ, सूझ जूआरिहि आपन दाऊ ||
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ, नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ||
सब कर हित रुख राउरि राखेँ, आयसु किएँ मुदित फुर भाषें ||
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई, माथेँ मानि करौ सिख सोई ||
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईँ, सो सब भाँति घटिहि सेवकाईँ ||
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा, भरत सनेहँ बिचारु न राखा ||
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी, भरत भगति बस भइ मति मोरी ||
मोरेँ जान भरत रुचि राखि, जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी ||

दो -भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि, 
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि ||२५८ ||

गुरु अनुराग भरत पर देखी, राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी ||
भरतहि धरम धुरंधर जानी, निज सेवक तन मानस बानी ||
बोले गुर आयस अनुकूला, बचन मंजु मृदु मंगलमूला ||
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई, भयउ न भुअन भरत सम भाई ||
जे गुर पद अंबुज अनुरागी, ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ||
राउर जा पर अस अनुरागू, को कहि सकइ भरत कर भागू ||
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई, करत बदन पर भरत बड़ाई ||
भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई, अस कहि राम रहे अरगाई ||

दो -तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात, 
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात ||२५९ ||

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई, गुरु साहिब अनुकूल अघाई ||
लखि अपने सिर सबु छरु भारू, कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू ||
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें, नीरज नयन नेह जल बाढ़ें ||
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा, एहि तें अधिक कहौं मैं काहा, 
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ, अपराधिहु पर कोह न काऊ ||
मो पर कृपा सनेह बिसेषी, खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ||
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू, कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ||
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही, हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ||

दो -महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन, 
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ||२६० ||

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा, नीच बीचु जननी मिस पारा, 
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा, अपनीं समुझि साधु सुचि को भा ||
मातु मंदि मैं साधु सुचाली, उर अस आनत कोटि कुचाली ||
फरइ कि कोदव बालि सुसाली, मुकुता प्रसव कि संबुक काली ||
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू, मोर अभाग उदधि अवगाहू ||
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू, जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ||
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा, एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ||
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू, लागत मोहि नीक परिनामू ||

दो -साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ, 
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ ||२६१ ||

भूपति मरन पेम पनु राखी, जननी कुमति जगतु सबु साखी ||
देखि न जाहि बिकल महतारी, जरहिं दुसह जर पुर नर नारी ||
महीं सकल अनरथ कर मूला, सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला ||
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा, करि मुनि बेष लखन सिय साथा ||
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ, संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ ||
बहुरि निहार निषाद सनेहू, कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू ||
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई, जिअत जीव जड़ सबइ सहाई ||
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी, तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी ||

दो -तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि, 
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ||२६२ ||

सुनि अति बिकल भरत बर बानी, आरति प्रीति बिनय नय सानी ||
सोक मगन सब सभाँ खभारू, मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू ||
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी, भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी ||
बोले उचित बचन रघुनंदू, दिनकर कुल कैरव बन चंदू ||
तात जाँय जियँ करहु गलानी, ईस अधीन जीव गति जानी ||
तीनि काल तिभुअन मत मोरें, पुन्यसिलोक तात तर तोरे ||
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई, जाइ लोकु परलोकु नसाई ||
दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई, जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ||

दो -मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार, 
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार ||२६३ ||

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी, भरत भूमि रह राउरि राखी ||
तात कुतरक करहु जनि जाएँ, बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ ||
मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं, बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ||
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना, मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ||
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें, करौं काह असमंजस जीकें ||
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी, तनु परिहरेउ पेम पन लागी ||
तासु बचन मेटत मन सोचू, तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू ||
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा, अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ||

दो -मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु, 
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ||२६४ ||

सुर गन सहित सभय सुरराजू, सोचहिं चाहत होन अकाजू ||
बनत उपाउ करत कछु नाहीं, राम सरन सब गे मन माहीं ||
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं, रघुपति भगत भगति बस अहहीं, 
सुधि करि अंबरीष दुरबासा, भे सुर सुरपति निपट निरासा ||
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा, नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ||
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा, अब सुर काज भरत के हाथा ||
आन उपाउ न देखिअ देवा, मानत रामु सुसेवक सेवा ||
हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि, निज गुन सील राम बस करतहि ||

दो -सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु, 
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ||२६५ ||

सीतापति सेवक सेवकाई, कामधेनु सय सरिस सुहाई ||
भरत भगति तुम्हरें मन आई, तजहु सोचु बिधि बात बनाई ||
देखु देवपति भरत प्रभाऊ, सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ ||
मन थिर करहु देव डरु नाहीं, भरतहि जानि राम परिछाहीं ||
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू, अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ||
निज सिर भारु भरत जियँ जाना, करत कोटि बिधि उर अनुमाना ||
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका, राम रजायस आपन नीका ||
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा, छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ||

दो -कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ, 
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ||२६६ ||

कहौं कहावौं का अब स्वामी, कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ||
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला, मिटी मलिन मन कलपित सूला ||
अपडर डरेउँ न सोच समूलें, रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें ||
मोर अभागु मातु कुटिलाई, बिधि गति बिषम काल कठिनाई ||
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला, प्रनतपाल पन आपन पाला ||
यह नइ रीति न राउरि होई, लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ||
जगु अनभल भल एकु गोसाईं, कहिअ होइ भल कासु भलाईं ||
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ, सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ||

दो -जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच, 
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच ||२६७ ||

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू, मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ||
अब करुनाकर कीजिअ सोई, जन हित प्रभु चित छोभु न होई ||
जो सेवकु साहिबहि सँकोची, निज हित चहइ तासु मति पोची ||
सेवक हित साहिब सेवकाई, करै सकल सुख लोभ बिहाई ||
स्वारथु नाथ फिरें सबही का, किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका ||
यह स्वारथ परमारथ सारु, सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु ||
देव एक बिनती सुनि मोरी, उचित होइ तस करब बहोरी ||
तिलक समाजु साजि सबु आना, करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना ||

दो -सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ, 
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ ||२६८ ||

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई, बहुरिअ सीय सहित रघुराई ||
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई, करुना सागर कीजिअ सोई ||
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु, मोरें नीति न धरम बिचारु ||
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू, रहत न आरत कें चित चेतू ||
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई, सो सेवकु लखि लाज लजाई ||
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू, स्वामि सनेहँ सराहत साधू ||
अब कृपाल मोहि सो मत भावा, सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा ||
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ, जग मंगल हित एक उपाऊ ||

दो -प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब, 
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ||२६९ ||

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे, साधु सराहि सुमन सुर बरषे ||
असमंजस बस अवध नेवासी, प्रमुदित मन तापस बनबासी ||
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची, प्रभु गति देखि सभा सब सोची ||
जनक दूत तेहि अवसर आए, मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए ||
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे, बेषु देखि भए निपट दुखारे ||
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता, कहहु बिदेह भूप कुसलाता ||
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा, बोले चर बर जोरें हाथा ||
बूझब राउर सादर साईं, कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं ||

दो -नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ, 
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ ||२७० ||

कोसलपति गति सुनि जनकौरा, भे सब लोक सोक बस बौरा ||
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू, नामु सत्य अस लाग न केहू ||
रानि कुचालि सुनत नरपालहि, सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ||
भरत राज रघुबर बनबासू, भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू ||
नृप बूझे बुध सचिव समाजू, कहहु बिचारि उचित का आजू ||
समुझि अवध असमंजस दोऊ, चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ ||
नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी, पठए अवध चतुर चर चारी ||
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ, आएहु बेगि न होइ लखाऊ ||

दो -गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति, 
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति ||२७१ ||

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी, जनक समाज जथामति बरनी ||
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति, भे सब सोच सनेहँ बिकल अति ||
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई, लिए सुभट साहनी बोलाई ||
घर पुर देस राखि रखवारे, हय गय रथ बहु जान सँवारे ||
दुघरी साधि चले ततकाला, किए बिश्रामु न मग महीपाला ||
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा, चले जमुन उतरन सबु लागा ||
खबरि लेन हम पठए नाथा, तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ||
साथ किरात छ सातक दीन्हे, मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ||

दो -सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु, 
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ||२७२ ||

गरइ गलानि कुटिल कैकेई, काहि कहै केहि दूषनु देई ||
अस मन आनि मुदित नर नारी, भयउ बहोरि रहब दिन चारी ||
एहि प्रकार गत बासर सोऊ, प्रात नहान लाग सबु कोऊ ||
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी, गनप गौरि तिपुरारि तमारी ||
रमा रमन पद बंदि बहोरी, बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ||
राजा रामु जानकी रानी, आनँद अवधि अवध रजधानी ||
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा, भरतहि रामु करहुँ जुबराजा ||
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू, देव देहु जग जीवन लाहू ||

दो -गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ, 
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ||२७३ ||

सुनि सनेहमय पुरजन बानी, निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी ||
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन, रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन ||
ऊँच नीच मध्यम नर नारी, लहहिं दरसु निज निज अनुहारी ||
सावधान सबही सनमानहिं, सकल सराहत कृपानिधानहिं ||
लरिकाइहि ते रघुबर बानी, पालत नीति प्रीति पहिचानी ||
सील सकोच सिंधु रघुराऊ, सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ||
कहत राम गुन गन अनुरागे, सब निज भाग सराहन लागे ||
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे, जिन्हहि रामु जानत करि मोरे ||

दो -प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु, 
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु ||२७४ ||

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा, आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा ||
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं, करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं ||
राम दरस लालसा उछाहू, पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ||
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही, बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ||
आवत जनकु चले एहि भाँती, सहित समाज प्रेम मति माती ||
आए निकट देखि अनुरागे, सादर मिलन परसपर लागे ||
लगे जनक मुनिजन पद बंदन, रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ||
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि, चले लवाइ समेत समाजहि ||

दो -आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु, 
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ||२७५ ||
कहब सँदेसु भरत के आएँ, नीति न तजिअ राजपदु पाएँ ||
पालेहु प्रजहि करम मन बानी, सेएहु मातु सकल सम जानी ||
ओर निबाहेहु भायप भाई, करि पितु मातु सुजन सेवकाई ||
तात भाँति तेहि राखब राऊ, सोच मोर जेहिं करै न काऊ ||
लखन कहे कछु बचन कठोरा, बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ||
बार बार निज सपथ देवाई, कहबि न तात लखन लरिकाई ||

दो -कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह, 
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह ||१५२ ||

तेहि अवसर रघुबर रूख पाई, केवट पारहि नाव चलाई ||
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती, देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती ||
मैं आपन किमि कहौं कलेसू, जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू ||
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ, हानि गलानि सोच बस भयऊ ||
सुत बचन सुनतहिं नरनाहू, परेउ धरनि उर दारुन दाहू ||
तलफत बिषम मोह मन मापा, माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा ||
करि बिलाप सब रोवहिं रानी, महा बिपति किमि जाइ बखानी ||
सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा, धीरजहू कर धीरजु भागा ||

दो -भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु, 
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु ||१५३ ||

प्रान कंठगत भयउ भुआलू, मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू ||
इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी, जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी ||
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना, रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना, 
उर धरि धीर राम महतारी, बोली बचन समय अनुसारी ||
नाथ समुझि मन करिअ बिचारू, राम बियोग पयोधि अपारू ||
करनधार तुम्ह अवध जहाजू, चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू ||
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू, नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू ||
जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी, रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी ||

दो -प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि, 
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि ||१५४ ||

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू, कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू ||
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही, कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही ||
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती, भइ जुग सरिस सिराति न राती ||
तापस अंध साप सुधि आई, कौसल्यहि सब कथा सुनाई ||
भयउ बिकल बरनत इतिहासा, राम रहित धिग जीवन आसा ||
सो तनु राखि करब मैं काहा, जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा ||
हा रघुनंदन प्रान पिरीते, तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते ||
हा जानकी लखन हा रघुबर, हा पितु हित चित चातक जलधर,

दो -राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम, 
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ||१५५ ||

जिअन मरन फलु दसरथ पावा, अंड अनेक अमल जसु छावा ||
जिअत राम बिधु बदनु निहारा, राम बिरह करि मरनु सँवारा ||
सोक बिकल सब रोवहिं रानी, रूपु सील बलु तेजु बखानी ||
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा, परहीं भूमितल बारहिं बारा ||
बिलपहिं बिकल दास अरु दासी, घर घर रुदनु करहिं पुरबासी ||
अँथयउ आजु भानुकुल भानू, धरम अवधि गुन रूप निधानू ||
गारीं सकल कैकइहि देहीं, नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं ||
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी, आए सकल महामुनि ग्यानी ||

दो -तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास, 
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास ||१५६ ||

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा, दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा ||
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू, नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू ||
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई, गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई ||
सुनि मुनि आयसु धावन धाए, चले बेग बर बाजि लजाए ||
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें, कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें ||
देखहिं राति भयानक सपना, जागि करहिं कटु कोटि कलपना ||
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना, सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना ||
मागहिं हृदयँ महेस मनाई, कुसल मातु पितु परिजन भाई ||

दो -एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ, 
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ ||१५७ ||

चले समीर बेग हय हाँके, नाघत सरित सैल बन बाँके ||
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई, अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई ||
एक निमेष बरस सम जाई, एहि बिधि भरत नगर निअराई ||
असगुन होहिं नगर पैठारा, रटहिं कुभाँति कुखेत करारा ||
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला, सुनि सुनि होइ भरत मन सूला ||
श्रीहत सर सरिता बन बागा, नगरु बिसेषि भयावनु लागा ||
खग मृग हय गय जाहिं न जोए, राम बियोग कुरोग बिगोए ||
नगर नारि नर निपट दुखारी, मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ||

दो -पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं, 
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं ||१५८ ||

हाट बाट नहिं जाइ निहारी, जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी ||
आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि, हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि ||
सजि आरती मुदित उठि धाई, द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई ||
भरत दुखित परिवारु निहारा, मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा ||
कैकेई हरषित एहि भाँति, मनहुँ मुदित दव लाइ किराती ||
सुतहि ससोच देखि मनु मारें, पूँछति नैहर कुसल हमारें ||
सकल कुसल कहि भरत सुनाई, पूँछी निज कुल कुसल भलाई ||
कहु कहँ तात कहाँ सब माता, कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता ||

दो -
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन, 
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन ||१५९ ||

तात बात मैं सकल सँवारी, भै मंथरा सहाय बिचारी ||
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ, भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ ||
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा, जनु सहमेउ करि केहरि नादा ||
तात तात हा तात पुकारी, परे भूमितल ब्याकुल भारी ||
चलत न देखन पायउँ तोही, तात न रामहि सौंपेहु मोही ||
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी, कहु पितु मरन हेतु महतारी ||
सुनि सुत बचन कहति कैकेई, मरमु पाँछि जनु माहुर देई ||
आदिहु तें सब आपनि करनी, कुटिल कठोर मुदित मन बरनी ||

दो -भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु, 
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु ||१६० ||

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति, मनहुँ जरे पर लोनु लगावति ||
तात राउ नहिं सोचे जोगू, बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू ||
जीवत सकल जनम फल पाए, अंत अमरपति सदन सिधाए ||
अस अनुमानि सोच परिहरहू, सहित समाज राज पुर करहू ||
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू, पाकें छत जनु लाग अँगारू ||
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा, पापनि सबहि भाँति कुल नासा ||
जौं पै कुरुचि रही अति तोही, जनमत काहे न मारे मोही ||
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा, मीन जिअन निति बारि उलीचा ||

दो -हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ, 
जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ ||१६१ ||

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ, खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ ||
बर मागत मन भइ नहिं पीरा, गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ||
भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही, मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही ||
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी, सकल कपट अघ अवगुन खानी ||
सरल सुसील धरम रत राऊ, सो किमि जानै तीय सुभाऊ ||
अस को जीव जंतु जग माहीं, जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं ||
भे अति अहित रामु तेउ तोही, को तू अहसि सत्य कहु मोही ||
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई, आँखि ओट उठि बैठहिं जाई ||

दो -राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि, 
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ||१६२ ||

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई, जरहिं गात रिस कछु न बसाई ||
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई, बसन बिभूषन बिबिध बनाई ||
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई, बरत अनल घृत आहुति पाई ||
हुमगि लात तकि कूबर मारा, परि मुह भर महि करत पुकारा ||
कूबर टूटेउ फूट कपारू, दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू ||
आह दइअ मैं काह नसावा, करत नीक फलु अनइस पावा ||
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी, लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ||
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई, कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ||

दो -मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार, 
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ||१६३ ||

भरतहि देखि मातु उठि धाई, मुरुछित अवनि परी झइँ आई ||
देखत भरतु बिकल भए भारी, परे चरन तन दसा बिसारी ||
मातु तात कहँ देहि देखाई, कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ||
कैकइ कत जनमी जग माझा, जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा ||
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही, अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ||
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी, गति असि तोरि मातु जेहि लागी ||
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू, मैं केवल सब अनरथ हेतु ||
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी, दुसह दाह दुख दूषन भागी ||

दो -मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि ||
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ||१६४ ||

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए, अति हित मनहुँ राम फिरि आए ||
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई, सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ||
देखि सुभाउ कहत सबु कोई, राम मातु अस काहे न होई ||
माताँ भरतु गोद बैठारे, आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे ||
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू, कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ||
जनि मानहु हियँ हानि गलानी, काल करम गति अघटित जानि ||
काहुहि दोसु देहु जनि ताता, भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ||
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा, अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ||

दो -पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर, 
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर ||१६५ ||

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू, सब कर सब बिधि करि परितोषू ||
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी, रहइ न राम चरन अनुरागी ||
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा, रहहिं न जतन किए रघुनाथा ||
तब रघुपति सबही सिरु नाई, चले संग सिय अरु लघु भाई ||
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए, गइउँ न संग न प्रान पठाए ||
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें, तउ न तजा तनु जीव अभागें ||
मोहि न लाज निज नेहु निहारी, राम सरिस सुत मैं महतारी ||
जिऐ मरै भल भूपति जाना, मोर हृदय सत कुलिस समाना ||

दो -कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास, 
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ||१६६ ||

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई, कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ||
भाँति अनेक भरतु समुझाए, कहि बिबेकमय बचन सुनाए ||
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं, कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं ||
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी, बोले भरत जोरि जुग पानी ||
जे अघ मातु पिता सुत मारें, गाइ गोठ महिसुर पुर जारें ||
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें, मीत महीपति माहुर दीन्हें ||
जे पातक उपपातक अहहीं, करम बचन मन भव कबि कहहीं ||
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता, जौं यहु होइ मोर मत माता ||

दो -जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर, 
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर ||१६७ ||

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं, पिसुन पराय पाप कहि देहीं ||
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी, बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी ||
लोभी लंपट लोलुपचारा, जे ताकहिं परधनु परदारा ||
पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा, जौं जननी यहु संमत मोरा ||
जे नहिं साधुसंग अनुरागे, परमारथ पथ बिमुख अभागे ||
जे न भजहिं हरि नरतनु पाई, जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ||
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं, बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ||
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ, जननी जौं यहु जानौं भेऊ ||

दो -मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ, 
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ ||१६८ ||

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे, तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ||
बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी, होइ बारिचर बारि बिरागी ||
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू, तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू ||
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं, सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ||
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए, थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए ||
करत बिलाप बहुत यहि भाँती, बैठेहिं बीति गइ सब राती ||
बामदेउ बसिष्ठ तब आए, सचिव महाजन सकल बोलाए ||
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे, कहि परमारथ बचन सुदेसे ||

दो -तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु, 
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ||१६९ ||

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा, परम बिचित्र बिमानु बनावा ||
गहि पद भरत मातु सब राखी, रहीं रानि दरसन अभिलाषी ||
चंदन अगर भार बहु आए, अमित अनेक सुगंध सुहाए ||
सरजु तीर रचि चिता बनाई, जनु सुरपुर सोपान सुहाई ||
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही, बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ||
सोधि सुमृति सब बेद पुराना, कीन्ह भरत दसगात बिधाना ||
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा, तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ||
भए बिसुद्ध दिए सब दाना, धेनु बाजि गज बाहन नाना ||

दो -सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम, 
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ||१७० ||

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी, सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ||
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए, सचिव महाजन सकल बोलाए ||
बैठे राजसभाँ सब जाई, पठए बोलि भरत दोउ भाई ||
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे, नीति धरममय बचन उचारे ||
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी, कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी ||
भूप धरमब्रतु सत्य सराहा, जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ||
कहत राम गुन सील सुभाऊ, सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ||
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी, सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ||

दो -सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ, 
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ||१७१ ||

अस बिचारि केहि देइअ दोसू, ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ||
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं, सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ||
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना, तजि निज धरमु बिषय लयलीना ||
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना, जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ||
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू, जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ||
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी, मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ||
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी, कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ||
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई, जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ||

दो -सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग, 
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग ||१७२ ||

बैखानस सोइ सोचै जोगु, तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ||
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी, जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ||
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी, निज तनु पोषक निरदय भारी ||
सोचनीय सबहि बिधि सोई, जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ||
सोचनीय नहिं कोसलराऊ, भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ||
भयउ न अहइ न अब होनिहारा, भूप भरत जस पिता तुम्हारा ||
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा, बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ||

दो -कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु, 
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ||१७३ ||

सब प्रकार भूपति बड़भागी, बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ||
यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू, सिर धरि राज रजायसु करहू ||
राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा, पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ||
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी, तनु परिहरेउ राम बिरहागी ||
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना, करहु तात पितु बचन प्रवाना ||
करहु सीस धरि भूप रजाई, हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ||
परसुराम पितु अग्या राखी, मारी मातु लोक सब साखी ||
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ, पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ||

दो -अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन, 
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ||१७४ ||

अवसि नरेस बचन फुर करहू, पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ||
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू, तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू ||
बेद बिदित संमत सबही का, जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ||
करहु राजु परिहरहु गलानी, मानहु मोर बचन हित जानी ||
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं, अनुचित कहब न पंडित केहीं ||
कौसल्यादि सकल महतारीं, तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ||
परम तुम्हार राम कर जानिहि, सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ||
सौंपेहु राजु राम कै आएँ, सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ||

दो -कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि, 
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ||१७५ ||

कौसल्या धरि धीरजु कहई, पूत पथ्य गुर आयसु अहई ||
सो आदरिअ करिअ हित मानी, तजिअ बिषादु काल गति जानी ||
बन रघुपति सुरपति नरनाहू, तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ||
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा, तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा ||
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई, धीरजु धरहु मातु बलि जाई ||
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू, प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ||
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु, सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ||
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी, सील सनेह सरल रस सानी ||

छं -सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए, 
लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए ||
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की, 
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ||

सो -भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि, 
बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ||१७६ ||

मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम 

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका, प्रजा सचिव संमत सबही का ||
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा, अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ||
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी, सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ||
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू, धरमु जाइ सिर पातक भारू ||
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई, जो आचरत मोर भल होई ||
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें, तदपि होत परितोषु न जी कें ||
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू, मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ||
ऊतरु देउँ छमब अपराधू, दुखित दोष गुन गनहिं न साधू ||

दो -पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु, 
एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु ||१७७ ||

हित हमार सियपति सेवकाई, सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ||
मैं अनुमानि दीख मन माहीं, आन उपायँ मोर हित नाहीं ||
सोक समाजु राजु केहि लेखें, लखन राम सिय बिनु पद देखें ||
बादि बसन बिनु भूषन भारू, बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ||
सरुज सरीर बादि बहु भोगा, बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ||
जायँ जीव बिनु देह सुहाई, बादि मोर सबु बिनु रघुराई ||
जाउँ राम पहिं आयसु देहू, एकहिं आँक मोर हित एहू ||
मोहि नृप करि भल आपन चहहू, सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ||

दो -कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज, 
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ||१७८ ||

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू, चाहिअ धरमसील नरनाहू ||
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं, रसा रसातल जाइहि तबहीं ||
मोहि समान को पाप निवासू, जेहि लगि सीय राम बनबासू ||
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा, बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा ||
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू, बैठ बात सब सुनउँ सचेतू ||
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू, रहे प्रान सहि जग उपहासू ||
राम पुनीत बिषय रस रूखे, लोलुप भूमि भोग के भूखे ||
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई, निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई ||

दो -कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर, 
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ||१७९ ||

कैकेई भव तनु अनुरागे, पाँवर प्रान अघाइ अभागे ||
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे, देखब सुनब बहुत अब आगे ||
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा, पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा ||
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू, दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू ||
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू, कीन्ह कैकेईं सब कर काजू ||
एहि तें मोर काह अब नीका, तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका ||
कैकई जठर जनमि जग माहीं, यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं ||
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई, प्रजा पाँच कत करहु सहाई ||

दो -ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार, 
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ||१८० ||

कैकइ सुअन जोगु जग जोई, चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई ||
दसरथ तनय राम लघु भाई, दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई ||
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका, राय रजायसु सब कहँ नीका ||
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही, कहहु सुखेन जथा रुचि जेही ||
मोहि कुमातु समेत बिहाई, कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई ||
मो बिनु को सचराचर माहीं, जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं ||
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू, अदिनु मोर नहि दूषन काहू ||
संसय सील प्रेम बस अहहू, सबुइ उचित सब जो कछु कहहू ||

दो -राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि, 
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ||१८१||

गुर बिबेक सागर जगु जाना, जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ||
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ, भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ||
परिहरि रामु सीय जग माहीं, कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं ||
सो मैं सुनब सहब सुखु मानी, अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी ||
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू, परलोकहु कर नाहिन सोचू ||
एकइ उर बस दुसह दवारी, मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ||
जीवन लाहु लखन भल पावा, सबु तजि राम चरन मनु लावा ||
मोर जनम रघुबर बन लागी, झूठ काह पछिताउँ अभागी ||

दो -आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ, 
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ ||१८२ ||

आन उपाउ मोहि नहि सूझा, को जिय कै रघुबर बिनु बूझा ||
एकहिं आँक इहइ मन माहीं, प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं ||
जद्यपि मैं अनभल अपराधी, भै मोहि कारन सकल उपाधी ||
तदपि सरन सनमुख मोहि देखी, छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी ||
सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ, कृपा सनेह सदन रघुराऊ ||
अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा, मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा ||
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी, आयसु आसिष देहु सुबानी ||
जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी, आवहिं बहुरि रामु रजधानी ||

दो -जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस, 
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस ||१८३ ||

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे, राम सनेह सुधाँ जनु पागे ||
लोग बियोग बिषम बिष दागे, मंत्र सबीज सुनत जनु जागे ||
मातु सचिव गुर पुर नर नारी, सकल सनेहँ बिकल भए भारी ||
भरतहि कहहि सराहि सराही, राम प्रेम मूरति तनु आही ||
तात भरत अस काहे न कहहू, प्रान समान राम प्रिय अहहू ||
जो पावँरु अपनी जड़ताई, तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ||
सो सठु कोटिक पुरुष समेता, बसिहि कलप सत नरक निकेता ||
अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई, हरइ गरल दुख दारिद दहई ||

दो -अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह, 
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ||१८४ ||

भा सब कें मन मोदु न थोरा, जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ||
चलत प्रात लखि निरनउ नीके, भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ||
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई, चले सकल घर बिदा कराई ||
धन्य भरत जीवनु जग माहीं, सीलु सनेहु सराहत जाहीं ||
कहहि परसपर भा बड़ काजू, सकल चलै कर साजहिं साजू ||
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी, सो जानइ जनु गरदनि मारी ||
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू, को न चहइ जग जीवन लाहू ||

दो -जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ, 
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ||१८५ ||

घर घर साजहिं बाहन नाना, हरषु हृदयँ परभात पयाना ||
भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू, नगरु बाजि गज भवन भँडारू ||
संपति सब रघुपति कै आही, जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही ||
तौ परिनाम न मोरि भलाई, पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ||
करइ स्वामि हित सेवकु सोई, दूषन कोटि देइ किन कोई ||
अस बिचारि सुचि सेवक बोले, जे सपनेहुँ निज धरम न डोले ||
कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा, जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ||
करि सबु जतनु राखि रखवारे, राम मातु पहिं भरतु सिधारे ||

दो -आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान, 
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान ||१८६ ||

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी, चहत प्रात उर आरत भारी ||
जागत सब निसि भयउ बिहाना, भरत बोलाए सचिव सुजाना ||
कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू, बनहिं देब मुनि रामहिं राजू ||
बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे, तुरत तुरग रथ नाग सँवारे ||
अरुंधती अरु अगिनि समाऊ, रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ ||
बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना, चले सकल तप तेज निधाना ||
नगर लोग सब सजि सजि जाना, चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना ||
सिबिका सुभग न जाहिं बखानी, चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी ||

दो -सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ, 
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ ||१८७ ||

राम दरस बस सब नर नारी, जनु करि करिनि चले तकि बारी ||
बन सिय रामु समुझि मन माहीं, सानुज भरत पयादेहिं जाहीं ||
देखि सनेहु लोग अनुरागे, उतरि चले हय गय रथ त्यागे ||
जाइ समीप राखि निज डोली, राम मातु मृदु बानी बोली ||
तात चढ़हु रथ बलि महतारी, होइहि प्रिय परिवारु दुखारी ||
तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू, सकल सोक कृस नहिं मग जोगू ||
सिर धरि बचन चरन सिरु नाई, रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई ||
तमसा प्रथम दिवस करि बासू, दूसर गोमति तीर निवासू ||

दो -पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग, 
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ||१८८ ||

सई तीर बसि चले बिहाने, सृंगबेरपुर सब निअराने ||
समाचार सब सुने निषादा, हृदयँ बिचार करइ सबिषादा ||
कारन कवन भरतु बन जाहीं, है कछु कपट भाउ मन माहीं ||
जौं पै जियँ न होति कुटिलाई, तौ कत लीन्ह संग कटकाई ||
जानहिं सानुज रामहि मारी, करउँ अकंटक राजु सुखारी ||
भरत न राजनीति उर आनी, तब कलंकु अब जीवन हानी ||
सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा, रामहि समर न जीतनिहारा ||
का आचरजु भरतु अस करहीं, नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ||

दो -अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु, 
हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु ||१८९ ||

होहु सँजोइल रोकहु घाटा, ठाटहु सकल मरै के ठाटा ||
सनमुख लोह भरत सन लेऊँ, जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ||
समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा, राम काजु छनभंगु सरीरा ||
भरत भाइ नृपु मै जन नीचू, बड़ें भाग असि पाइअ मीचू ||
स्वामि काज करिहउँ रन रारी, जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ||
तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें, दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ||
साधु समाज न जाकर लेखा, राम भगत महुँ जासु न रेखा ||
जायँ जिअत जग सो महि भारू, जननी जौबन बिटप कुठारू ||

दो -बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु, 
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ||१९० ||

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ, सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ||
भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा, एकहिं एक बढ़ावइ करषा ||
चले निषाद जोहारि जोहारी, सूर सकल रन रूचइ रारी ||
सुमिरि राम पद पंकज पनहीं, भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ||
अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं, फरसा बाँस सेल सम करहीं ||
एक कुसल अति ओड़न खाँड़े, कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े ||
निज निज साजु समाजु बनाई, गुह राउतहि जोहारे जाई ||
देखि सुभट सब लायक जाने, लै लै नाम सकल सनमाने ||

दो -भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि, 
सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि ||१९१ ||

राम प्रताप नाथ बल तोरे, करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ||
जीवत पाउ न पाछें धरहीं, रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं ||
दीख निषादनाथ भल टोलू, कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू ||
एतना कहत छींक भइ बाँए, कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए ||
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी, भरतहि मिलिअ न होइहि रारी ||
रामहि भरतु मनावन जाहीं, सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ||
सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा, सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा ||
भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें, बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें ||

दो -गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ, 
बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ ||१९२ ||

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ, बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ ||
अस कहि भेंट सँजोवन लागे, कंद मूल फल खग मृग मागे ||
मीन पीन पाठीन पुराने, भरि भरि भार कहारन्ह आने ||
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए, मंगल मूल सगुन सुभ पाए ||
देखि दूरि तें कहि निज नामू, कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू ||
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा, भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ||
राम सखा सुनि संदनु त्यागा, चले उतरि उमगत अनुरागा ||
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई, कीन्ह जोहारु माथ महि लाई ||

दो -करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ, 
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ ||१९३ ||

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती, लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती ||
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला, सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ||
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा, जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ||
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता, मिलत पुलक परिपूरित गाता ||
राम राम कहि जे जमुहाहीं, तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ||
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा, कुल समेत जगु पावन कीन्हा ||
करमनास जलु सुरसरि परई, तेहि को कहहु सीस नहिं धरई ||
उलटा नामु जपत जगु जाना, बालमीकि भए ब्रह्म समाना ||

दो -स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात, 
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ||१९४ ||

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई, केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई ||
राम नाम महिमा सुर कहहीं, सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं ||
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा, पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ||
देखि भरत कर सील सनेहू, भा निषाद तेहि समय बिदेहू ||
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा, भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा ||
धरि धीरजु पद बंदि बहोरी, बिनय सप्रेम करत कर जोरी ||
कुसल मूल पद पंकज पेखी, मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी ||
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें, सहित कोटि कुल मंगल मोरें ||

दो -समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ, 
जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ||१९५ ||

कपटी कायर कुमति कुजाती, लोक बेद बाहेर सब भाँती ||
राम कीन्ह आपन जबही तें, भयउँ भुवन भूषन तबही तें ||
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई, मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई ||
कहि निषाद निज नाम सुबानीं, सादर सकल जोहारीं रानीं ||
जानि लखन सम देहिं असीसा, जिअहु सुखी सय लाख बरीसा ||
निरखि निषादु नगर नर नारी, भए सुखी जनु लखनु निहारी ||
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू, भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू ||
सुनि निषादु निज भाग बड़ाई, प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई ||

दो -सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ, 
घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ ||१९६ ||

सृंगबेरपुर भरत दीख जब, भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब ||
सोहत दिएँ निषादहि लागू, जनु तनु धरें बिनय अनुरागू ||
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा, दीखि जाइ जग पावनि गंगा ||
रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू, भा मनु मगनु मिले जनु रामू ||
करहिं प्रनाम नगर नर नारी, मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी ||
करि मज्जनु मागहिं कर जोरी, रामचंद्र पद प्रीति न थोरी ||
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू, सकल सुखद सेवक सुरधेनू ||
जोरि पानि बर मागउँ एहू, सीय राम पद सहज सनेहू ||

दो -एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ, 
मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ ||१९७ ||

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा, भरत सोधु सबही कर लीन्हा ||
सुर सेवा करि आयसु पाई, राम मातु पहिं गे दोउ भाई ||
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी, जननीं सकल भरत सनमानी ||
भाइहि सौंपि मातु सेवकाई, आपु निषादहि लीन्ह बोलाई ||
चले सखा कर सों कर जोरें, सिथिल सरीर सनेह न थोरें ||
पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ, नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ ||
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए, कहत भरे जल लोचन कोए ||
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू, तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू ||

दो -जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु, 
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु ||१९८ ||

कुस साँथरी निहारि सुहाई, कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई ||
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई, बनइ न कहत प्रीति अधिकाई ||
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे, राखे सीस सीय सम लेखे ||
सजल बिलोचन हृदयँ गलानी, कहत सखा सन बचन सुबानी ||
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना, जथा अवध नर नारि बिलीना ||
पिता जनक देउँ पटतर केही, करतल भोगु जोगु जग जेही ||
ससुर भानुकुल भानु भुआलू, जेहि सिहात अमरावतिपालू ||
प्राननाथु रघुनाथ गोसाई, जो बड़ होत सो राम बड़ाई ||

दो -पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि, 
बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि ||१९९ ||

लालन जोगु लखन लघु लोने, भे न भाइ अस अहहिं न होने ||
पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे, सिय रघुबरहि प्रानपिआरे ||
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ, तात बाउ तन लाग न काऊ ||
ते बन सहहिं बिपति सब भाँती, निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती ||
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर, रूप सील सुख सब गुन सागर ||
पुरजन परिजन गुर पितु माता, राम सुभाउ सबहि सुखदाता ||
बैरिउ राम बड़ाई करहीं, बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ||
सारद कोटि कोटि सत सेषा, करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ||

दो -सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान, 
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान ||२०० ||

राम सुना दुखु कान न काऊ, जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ||
पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती, जोगवहिं जननि सकल दिन राती ||
ते अब फिरत बिपिन पदचारी, कंद मूल फल फूल अहारी ||
धिग कैकेई अमंगल मूला, भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला ||
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी, सबु उतपातु भयउ जेहि लागी ||
कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ, साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ ||
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू, नाथ करिअ कत बादि बिषादू ||
राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि, यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ||

छं -बिधि बाम की करनी कठिन जेंहिं मातु कीन्ही बावरी, 
तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी ||
तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ, 
परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ ||

सो -अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन, 
चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन ||२०१ ||

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा, बास चले सुमिरत रघुबीरा ||
यह सुधि पाइ नगर नर नारी, चले बिलोकन आरत भारी ||
परदखिना करि करहिं प्रनामा, देहिं कैकइहि खोरि निकामा ||
भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं, बाम बिधाताहि दूषन देहीं ||
एक सराहहिं भरत सनेहू, कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू ||
निंदहिं आपु सराहि निषादहि, को कहि सकइ बिमोह बिषादहि ||
एहि बिधि राति लोगु सबु जागा, भा भिनुसार गुदारा लागा ||
गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं, नईं नाव सब मातु चढ़ाईं ||
दंड चारि महँ भा सबु पारा, उतरि भरत तब सबहि सँभारा ||

दो -प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ, 
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ ||२०२ ||

कियउ निषादनाथु अगुआईं, मातु पालकीं सकल चलाईं ||
साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा, बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा ||
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू, सुमिरे लखन सहित सिय रामू ||
गवने भरत पयोदेहिं पाए, कोतल संग जाहिं डोरिआए ||
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा, होइअ नाथ अस्व असवारा ||
रामु पयोदेहि पायँ सिधाए, हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ||
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा, सब तें सेवक धरमु कठोरा ||
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी, सब सेवक गन गरहिं गलानी ||

दो -भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग, 
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ||२०३ ||

झलका झलकत पायन्ह कैंसें, पंकज कोस ओस कन जैसें ||
भरत पयादेहिं आए आजू, भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ||
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए, कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ||
सबिधि सितासित नीर नहाने, दिए दान महिसुर सनमाने ||
देखत स्यामल धवल हलोरे, पुलकि सरीर भरत कर जोरे ||
सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ||
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू, आरत काह न करइ कुकरमू ||
अस जियँ जानि सुजान सुदानी, सफल करहिं जग जाचक बानी ||

दो -अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान, 
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ||२०४ ||

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही, लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ||
सीता राम चरन रति मोरें, अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ||
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ, जाचत जलु पबि पाहन डारउ ||
चातकु रटनि घटें घटि जाई, बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई ||
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें, तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ||
भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी, भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ||
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू, राम चरन अनुराग अगाधू ||
बाद गलानि करहु मन माहीं, तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं ||

दो -तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल, 
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल ||२०५ ||

प्रमुदित तीरथराज निवासी, बैखानस बटु गृही उदासी ||
कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा, भरत सनेह सीलु सुचि साँचा ||
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए, भरद्वाज मुनिबर पहिं आए ||
दंड प्रनामु करत मुनि देखे, मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ||
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे, दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे ||
आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे, चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे ||
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू, बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू ||
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई, बिधि करतब पर किछु न बसाई ||

दो -तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति, 
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ||२०६ ||

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ, लोकु बेद बुध संमत दोऊ ||
तात तुम्हार बिमल जसु गाई, पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई ||
लोक बेद संमत सबु कहई, जेहि पितु देइ राजु सो लहई ||
राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई, देत राजु सुखु धरमु बड़ाई ||
राम गवनु बन अनरथ मूला, जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ||
सो भावी बस रानि अयानी, करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ||
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू, कहै सो अधम अयान असाधू ||
करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू, रामहि होत सुनत संतोषू ||

दो -अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु, 
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ||२०७ ||

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना, भूरिभाग को तुम्हहि समाना ||
यह तम्हार आचरजु न ताता, दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता ||
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं, पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं ||
लखन राम सीतहि अति प्रीती, निसि सब तुम्हहि सराहत बीती ||
जाना मरमु नहात प्रयागा, मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा ||
तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें, सुख जीवन जग जस जड़ नर कें ||
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई, प्रनत कुटुंब पाल रघुराई ||
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू, धरें देह जनु राम सनेहू ||

दो -तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु, 
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु ||२०८ ||

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा, रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ||
उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना, घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना ||
कोक तिलोक प्रीति अति करिही, प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही ||
निसि दिन सुखद सदा सब काहू, ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू ||
पूरन राम सुपेम पियूषा, गुर अवमान दोष नहिं दूषा ||
राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ, कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ||
भूप भगीरथ सुरसरि आनी, सुमिरत सकल सुंमगल खानी ||
दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं, अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं ||

दो -जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ ||
जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ ||२०९ ||

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा, जहँ बस राम पेम मृगरूपा ||
तात गलानि करहु जियँ जाएँ, डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ ||
., सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं, उदासीन तापस बन रहहीं ||
सब साधन कर सुफल सुहावा, लखन राम सिय दरसनु पावा ||
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा, सहित पयाग सुभाग हमारा ||
भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ, कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ ||
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे, साधु सराहि सुमन सुर बरषे ||
धन्य धन्य धुनि गगन पयागा, सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा ||

दो -पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन, 
करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन ||२१० ||

मुनि समाजु अरु तीरथराजू, साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू ||
एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई, एहि सम अधिक न अघ अधमाई ||
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ, उर अंतरजामी रघुराऊ ||
मोहि न मातु करतब कर सोचू, नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू ||
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू, पितहु मरन कर मोहि न सोकू ||
सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए, लछिमन राम सरिस सुत पाए ||
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू, भूप सोच कर कवन प्रसंगू ||
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं, करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही ||

दो -अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात, 
बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात ||२११ ||

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती, भूख न बासर नीद न राती ||
एहि कुरोग कर औषधु नाहीं, सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ||
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला, तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला ||
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू, गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु ||
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा, घालेसि सब जगु बारहबाटा ||
मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ, बसइ अवध नहिं आन उपाएँ ||
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई, सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई ||
तात करहु जनि सोचु बिसेषी, सब दुखु मिटहि राम पग देखी ||

दो -करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु, 
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ||२१२ ||

सुनि मुनि बचन भरत हिँय सोचू, भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ||
जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी, चरन बंदि बोले कर जोरी ||
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा, परम धरम यहु नाथ हमारा ||
भरत बचन मुनिबर मन भाए, सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ||
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई, कंद मूल फल आनहु जाई ||
भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए, प्रमुदित निज निज काज सिधाए ||
मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता, तसि पूजा चाहिअ जस देवता ||
सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई, आयसु होइ सो करहिं गोसाई ||

दो -राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज, 
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ||२१३ ||

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी, बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ||
कहहिं परसपर सिधि समुदाई, अतुलित अतिथि राम लघु भाई ||
मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू, होइ सुखी सब राज समाजू ||
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना, जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना ||
भोग बिभूति भूरि भरि राखे, देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे ||
दासीं दास साजु सब लीन्हें, जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें ||
सब समाजु सजि सिधि पल माहीं, जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं ||
प्रथमहिं बास दिए सब केही, सुंदर सुखद जथा रुचि जेही ||

दो -बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह, 
बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह ||२१४ ||

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका, सब लघु लगे लोकपति लोका ||
सुख समाजु नहिं जाइ बखानी, देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी ||
आसन सयन सुबसन बिताना, बन बाटिका बिहग मृग नाना ||
सुरभि फूल फल अमिअ समाना, बिमल जलासय बिबिध बिधाना, 
असन पान सुच अमिअ अमी से, देखि लोग सकुचात जमी से ||
सुर सुरभी सुरतरु सबही कें, लखि अभिलाषु सुरेस सची कें ||
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी, सब कहँ सुलभ पदारथ चारी ||
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा, देखि हरष बिसमय बस लोगा ||

दो -संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार ||
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ||२१५ ||

मासपारायण, उन्नीसवाँ विश्राम 

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा, नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा ||
रिषि आयसु असीस सिर राखी, करि दंडवत बिनय बहु भाषी ||
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे, चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें ||
रामसखा कर दीन्हें लागू, चलत देह धरि जनु अनुरागू ||
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया, पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया ||
लखन राम सिय पंथ कहानी, पूँछत सखहि कहत मृदु बानी ||
राम बास थल बिटप बिलोकें, उर अनुराग रहत नहिं रोकैं ||
दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला, भइ मृदु महि मगु मंगल मूला ||

दो -किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात, 
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात ||२१६ ||

जड़ चेतन मग जीव घनेरे, जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ||
ते सब भए परम पद जोगू, भरत दरस मेटा भव रोगू ||
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं, सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ||
बारक राम कहत जग जेऊ, होत तरन तारन नर तेऊ ||
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता, कस न होइ मगु मंगलदाता ||
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं, भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ||
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू, जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू ||
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई, रामहि भरतहि भेंट न होई ||

दो -रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि, 
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ||२१७ ||

बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने, सहसनयन बिनु लोचन जाने ||
मायापति सेवक सन माया, करइ त उलटि परइ सुरराया ||
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी, अब कुचालि करि होइहि हानी ||
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ, निज अपराध रिसाहिं न काऊ ||
जो अपराधु भगत कर करई, राम रोष पावक सो जरई ||
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा, यह महिमा जानहिं दुरबासा ||
भरत सरिस को राम सनेही, जगु जप राम रामु जप जेही ||

दो -मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु, 
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु ||२१८ ||

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा, रामहि सेवकु परम पिआरा ||
मानत सुखु सेवक सेवकाई, सेवक बैर बैरु अधिकाई ||
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू, गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू ||
करम प्रधान बिस्व करि राखा, जो जस करइ सो तस फलु चाखा ||
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा, भगत अभगत हृदय अनुसारा ||
अगुन अलेप अमान एकरस, रामु सगुन भए भगत पेम बस ||
राम सदा सेवक रुचि राखी, बेद पुरान साधु सुर साखी ||
अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई, करहु भरत पद प्रीति सुहाई ||

दो -राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल, 
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ||२१९ ||

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी, भरत राम आयस अनुसारी ||
स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू, भरत दोसु नहिं राउर मोहू ||
सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी, भा प्रमोदु मन मिटी गलानी ||
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ, लगे सराहन भरत सुभाऊ ||
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं, दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं ||
जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा, उमगत पेमु मनहँ चहु पासा ||
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना, पुरजन पेमु न जाइ बखाना ||
बीच बास करि जमुनहिं आए, निरखि नीरु लोचन जल छाए ||

दो -रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज, 
होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज ||२२० ||

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू, भयउ समय सम सबहि सुपासू ||
रातहिं घाट घाट की तरनी, आईं अगनित जाहिं न बरनी ||
प्रात पार भए एकहि खेंवाँ, तोषे रामसखा की सेवाँ ||
चले नहाइ नदिहि सिर नाई, साथ निषादनाथ दोउ भाई ||
आगें मुनिबर बाहन आछें, राजसमाज जाइ सबु पाछें ||
तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें, भूषन बसन बेष सुठि सादें ||
सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा, सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा ||
जहँ जहँ राम बास बिश्रामा, तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा ||

दो -मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ, 
देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ ||२२१ ||

कहहिं सपेम एक एक पाहीं, रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं ||
बय बपु बरन रूप सोइ आली, सीलु सनेहु सरिस सम चाली ||
बेषु न सो सखि सीय न संगा, आगें अनी चली चतुरंगा ||
नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा, सखि संदेहु होइ एहिं भेदा ||
तासु तरक तियगन मन मानी, कहहिं सकल तेहि सम न सयानी ||
तेहि सराहि बानी फुरि पूजी, बोली मधुर बचन तिय दूजी ||
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू, जेहि बिधि राम राज रस भंगू ||
भरतहि बहुरि सराहन लागी, सील सनेह सुभाय सुभागी ||

दो -चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु, 
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु ||२२२ ||

भायप भगति भरत आचरनू, कहत सुनत दुख दूषन हरनू ||
जो कछु कहब थोर सखि सोई, राम बंधु अस काहे न होई ||
हम सब सानुज भरतहि देखें, भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें ||
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं, कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं ||
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन, बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन ||
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी, लघु तिय कुल करतूति मलीनी ||
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा, कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ||
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा, जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ||

दो -भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु, 
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु ||२२३ ||

निज गुन सहित राम गुन गाथा, सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा ||
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा, निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा ||
मनहीं मन मागहिं बरु एहू, सीय राम पद पदुम सनेहू ||
मिलहिं किरात कोल बनबासी, बैखानस बटु जती उदासी ||
करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही, केहि बन लखनु रामु बैदेही ||
ते प्रभु समाचार सब कहहीं, भरतहि देखि जनम फलु लहहीं ||
जे जन कहहिं कुसल हम देखे, ते प्रिय राम लखन सम लेखे ||
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी, सुनत राम बनबास कहानी ||

दो -तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ, 
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ ||२२४ ||

मंगल सगुन होहिं सब काहू, फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू ||
भरतहि सहित समाज उछाहू, मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू ||
करत मनोरथ जस जियँ जाके, जाहिं सनेह सुराँ सब छाके ||
सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं, बिहबल बचन पेम बस बोलहिं ||
रामसखाँ तेहि समय देखावा, सैल सिरोमनि सहज सुहावा ||
जासु समीप सरित पय तीरा, सीय समेत बसहिं दोउ बीरा ||
देखि करहिं सब दंड प्रनामा, कहि जय जानकि जीवन रामा ||
प्रेम मगन अस राज समाजू, जनु फिरि अवध चले रघुराजू ||

दो -भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु, 
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ||२२५||

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें, गए कोस दुइ दिनकर ढरकें ||
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें, कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें ||
उहाँ रामु रजनी अवसेषा, जागे सीयँ सपन अस देखा ||
सहित समाज भरत जनु आए, नाथ बियोग ताप तन ताए ||
सकल मलिन मन दीन दुखारी, देखीं सासु आन अनुहारी ||
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन, भए सोचबस सोच बिमोचन ||
लखन सपन यह नीक न होई, कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ||
अस कहि बंधु समेत नहाने, पूजि पुरारि साधु सनमाने ||

छं -सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उत्तर दिसि देखत भए, 
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए ||
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे, 
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे ||

दो -सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर, 
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल ||२२६ ||

बहुरि सोचबस भे सियरवनू, कारन कवन भरत आगवनू ||
एक आइ अस कहा बहोरी, सेन संग चतुरंग न थोरी ||
सो सुनि रामहि भा अति सोचू, इत पितु बच इत बंधु सकोचू ||
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं, प्रभु चित हित थिति पावत नाही ||
समाधान तब भा यह जाने, भरतु कहे महुँ साधु सयाने ||
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू, कहत समय सम नीति बिचारू ||
बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं, सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई ||
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी, आपनि समुझि कहउँ अनुगामी ||

दो -नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान ||
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान ||२२७ ||

बिषई जीव पाइ प्रभुताई, मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ||
भरतु नीति रत साधु सुजाना, प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना ||
तेऊ आजु राम पदु पाई, चले धरम मरजाद मेटाई ||
कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी, जानि राम बनवास एकाकी ||
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू, आए करै अकंटक राजू ||
कोटि प्रकार कलपि कुटलाई, आए दल बटोरि दोउ भाई ||
जौं जियँ होति न कपट कुचाली, केहि सोहाति रथ बाजि गजाली ||
भरतहि दोसु देइ को जाएँ, जग बौराइ राज पदु पाएँ ||

दो -ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान, 
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान ||२२८ ||

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू, केहि न राजमद दीन्ह कलंकू ||
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ, रिपु रिन रंच न राखब काऊ ||
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई, निदरे रामु जानि असहाई ||
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी, समर सरोष राम मुखु पेखी ||
एतना कहत नीति रस भूला, रन रस बिटपु पुलक मिस फूला ||
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी, बोले सत्य सहज बलु भाषी ||
अनुचित नाथ न मानब मोरा, भरत हमहि उपचार न थोरा ||
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें, नाथ साथ धनु हाथ हमारें ||

दो -छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान, 
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान ||२२९ ||

उठि कर जोरि रजायसु मागा, मनहुँ बीर रस सोवत जागा ||
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा, साजि सरासनु सायकु हाथा ||
आजु राम सेवक जसु लेऊँ, भरतहि समर सिखावन देऊँ ||
राम निरादर कर फलु पाई, सोवहुँ समर सेज दोउ भाई ||
आइ बना भल सकल समाजू, प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू ||
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू, लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू ||
तैसेहिं भरतहि सेन समेता, सानुज निदरि निपातउँ खेता ||
जौं सहाय कर संकरु आई, तौ मारउँ रन राम दोहाई ||

दो -अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान, 
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान ||२३० ||

जगु भय मगन गगन भइ बानी, लखन बाहुबलु बिपुल बखानी ||
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा, को कहि सकइ को जाननिहारा ||
अनुचित उचित काजु किछु होऊ, समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ||
सहसा करि पाछैं पछिताहीं, कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ||
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने, राम सीयँ सादर सनमाने ||
कही तात तुम्ह नीति सुहाई, सब तें कठिन राजमदु भाई ||
जो अचवँत नृप मातहिं तेई, नाहिन साधुसभा जेहिं सेई ||
सुनहु लखन भल भरत सरीसा, बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा ||

दो -भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ||
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ||२३१ ||

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई, गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ||
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी, सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ||
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई, होइ न नृपमदु भरतहि भाई ||
लखन तुम्हार सपथ पितु आना, सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ||
सगुन खीरु अवगुन जलु ताता, मिलइ रचइ परपंचु बिधाता ||
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा, जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ||
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी, निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ||
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ, पेम पयोधि मगन रघुराऊ ||

दो -सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु, 
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु ||२३२ ||

जौं न होत जग जनम भरत को, सकल धरम धुर धरनि धरत को ||
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा, को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ||
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी, अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी ||
इहाँ भरतु सब सहित सहाए, मंदाकिनीं पुनीत नहाए ||
सरित समीप राखि सब लोगा, मागि मातु गुर सचिव नियोगा ||
चले भरतु जहँ सिय रघुराई, साथ निषादनाथु लघु भाई ||
समुझि मातु करतब सकुचाहीं, करत कुतरक कोटि मन माहीं ||
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ, उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ||

दो -मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर, 
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर ||२३३ ||

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी, जौ सनमानहिं सेवकु मानी ||
मोरें सरन रामहि की पनही, राम सुस्वामि दोसु सब जनही ||
जग जस भाजन चातक मीना, नेम पेम निज निपुन नबीना ||
अस मन गुनत चले मग जाता, सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ||
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी, चलत भगति बल धीरज धोरी ||
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ, तब पथ परत उताइल पाऊ ||
भरत दसा तेहि अवसर कैसी, जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी ||
देखि भरत कर सोचु सनेहू, भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू ||

दो -लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु, 
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु ||२३४ ||

सेवक बचन सत्य सब जाने, आश्रम निकट जाइ निअराने ||
भरत दीख बन सैल समाजू, मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू ||
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी, त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी ||
जाइ सुराज सुदेस सुखारी, होहिं भरत गति तेहि अनुहारी ||
राम बास बन संपति भ्राजा, सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ||
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू, बिपिन सुहावन पावन देसू ||
भट जम नियम सैल रजधानी, सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ||
सकल अंग संपन्न सुराऊ, राम चरन आश्रित चित चाऊ ||

दो -जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु, 
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु ||२३५ ||

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे, जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे ||
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना, प्रजा समाजु न जाइ बखाना ||
खगहा करि हरि बाघ बराहा, देखि महिष बृष साजु सराहा ||
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा, जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ||
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं, मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं ||
चक चकोर चातक सुक पिक गन, कूजत मंजु मराल मुदित मन ||
अलिगन गावत नाचत मोरा, जनु सुराज मंगल चहु ओरा ||
बेलि बिटप तृन सफल सफूला, सब समाजु मुद मंगल मूला ||

दो -राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु, 
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ||२३६ ||

मासपारायण, बीसवाँ विश्राम नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम 

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई, कहेउ भरत सन भुजा उठाई ||
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला, पाकरि जंबु रसाल तमाला ||
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा, मंजु बिसाल देखि मनु मोहा ||
नील सघन पल्ल्व फल लाला, अबिरल छाहँ सुखद सब काला ||
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी, बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी ||
ए तरु सरित समीप गोसाँई, रघुबर परनकुटी जहँ छाई ||
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए, कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए ||
बट छायाँ बेदिका बनाई, सियँ निज पानि सरोज सुहाई ||

दो -जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान, 
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ||२३७ ||

सखा बचन सुनि बिटप निहारी, उमगे भरत बिलोचन बारी ||
करत प्रनाम चले दोउ भाई, कहत प्रीति सारद सकुचाई ||
हरषहिं निरखि राम पद अंका, मानहुँ पारसु पायउ रंका ||
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं, रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं ||
देखि भरत गति अकथ अतीवा, प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा ||
सखहि सनेह बिबस मग भूला, कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला ||
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे, सहज सनेहु सराहन लागे ||
होत न भूतल भाउ भरत को, अचर सचर चर अचर करत को ||

दो -पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर, 
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ||२३८ ||

सखा समेत मनोहर जोटा, लखेउ न लखन सघन बन ओटा ||
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन, सकल सुमंगल सदनु सुहावन ||
करत प्रबेस मिटे दुख दावा, जनु जोगीं परमारथु पावा ||
देखे भरत लखन प्रभु आगे, पूँछे बचन कहत अनुरागे ||
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें, तून कसें कर सरु धनु काँधें ||
बेदी पर मुनि साधु समाजू, सीय सहित राजत रघुराजू ||
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा, जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा ||
कर कमलनि धनु सायकु फेरत, जिय की जरनि हरत हँसि हेरत ||

दो -लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु, 
ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु ||२३९ ||

सानुज सखा समेत मगन मन, बिसरे हरष सोक सुख दुख गन ||
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई, भूतल परे लकुट की नाई ||
बचन सपेम लखन पहिचाने, करत प्रनामु भरत जियँ जाने ||
बंधु सनेह सरस एहि ओरा, उत साहिब सेवा बस जोरा ||
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई, सुकबि लखन मन की गति भनई ||
रहे राखि सेवा पर भारू, चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू ||
कहत सप्रेम नाइ महि माथा, भरत प्रनाम करत रघुनाथा ||
उठे रामु सुनि पेम अधीरा, कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा ||

दो -बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान, 
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान ||२४० ||

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी, कबिकुल अगम करम मन बानी ||
परम पेम पूरन दोउ भाई, मन बुधि चित अहमिति बिसराई ||
कहहु सुपेम प्रगट को करई, केहि छाया कबि मति अनुसरई ||
कबिहि अरथ आखर बलु साँचा, अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा ||
अगम सनेह भरत रघुबर को, जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को ||
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती, बाज सुराग कि गाँडर ताँती ||
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की, सुरगन सभय धकधकी धरकी ||
समुझाए सुरगुरु जड़ जागे, बरषि प्रसून प्रसंसन लागे ||

दो -मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम, 
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम ||२४१ ||

भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई, बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई ||
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे, अभिमत आसिष पाइ अनंदे ||
सानुज भरत उमगि अनुरागा, धरि सिर सिय पद पदुम परागा ||
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए, सिर कर कमल परसि बैठाए ||
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं, मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं ||
सब बिधि सानुकूल लखि सीता, भे निसोच उर अपडर बीता ||
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा, प्रेम भरा मन निज गति छूँछा ||
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि, जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि ||

दो -नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग, 
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग ||२४२ ||

सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू, सिय समीप राखे रिपुदवनू ||
चले सबेग रामु तेहि काला, धीर धरम धुर दीनदयाला ||
गुरहि देखि सानुज अनुरागे, दंड प्रनाम करन प्रभु लागे ||
मुनिबर धाइ लिए उर लाई, प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई ||
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू, कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू ||
रामसखा रिषि बरबस भेंटा, जनु महि लुठत सनेह समेटा ||
रघुपति भगति सुमंगल मूला, नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला ||
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं, बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं ||

दो -जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ, 
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ ||२४३ ||

आरत लोग राम सबु जाना, करुनाकर सुजान भगवाना ||
जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी, तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी ||
सानुज मिलि पल महु सब काहू, कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू ||
यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं, जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं ||
मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा, पुरजन सकल सराहहिं भागा ||
देखीं राम दुखित महतारीं, जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं ||
प्रथम राम भेंटी कैकेई, सरल सुभायँ भगति मति भेई ||
पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी, काल करम बिधि सिर धरि खोरी ||

दो -भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु ||
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु ||२४४ ||

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई, सहित बिप्रतिय जे सँग आई ||
गंग गौरि सम सब सनमानीं ||देहिं असीस मुदित मृदु बानी ||
गहि पद लगे सुमित्रा अंका, जनु भेटीं संपति अति रंका ||
पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता, परे पेम ब्याकुल सब गाता ||
अति अनुराग अंब उर लाए, नयन सनेह सलिल अन्हवाए ||
तेहि अवसर कर हरष बिषादू, किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू ||
मिलि जननहि सानुज रघुराऊ, गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ ||
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू, जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू ||

दो -महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ ||
पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ ||२४५ ||

सीय आइ मुनिबर पग लागी, उचित असीस लही मन मागी ||
गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता, मिली पेमु कहि जाइ न जेता ||
बंदि बंदि पग सिय सबही के, आसिरबचन लहे प्रिय जी के ||
सासु सकल जब सीयँ निहारीं, मूदे नयन सहमि सुकुमारीं ||
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं, काह कीन्ह करतार कुचालीं ||
तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा, सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा ||
जनकसुता तब उर धरि धीरा, नील नलिन लोयन भरि नीरा ||
मिली सकल सासुन्ह सिय जाई, तेहि अवसर करुना महि छाई ||

दो -लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग ||
हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग ||२४६ ||

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं, बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ||
कहि जग गति मायिक मुनिनाथा, कहे कछुक परमारथ गाथा ||
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा, सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा ||
मरन हेतु निज नेहु बिचारी, भे अति बिकल धीर धुर धारी ||
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी, बिलपत लखन सीय सब रानी ||
सोक बिकल अति सकल समाजू, मानहुँ राजु अकाजेउ आजू ||
मुनिबर बहुरि राम समुझाए, सहित समाज सुसरित नहाए ||
ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा, मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा ||

दो -भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह ||
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह ||२४७ ||

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी, भे पुनीत पातक तम तरनी ||
जासु नाम पावक अघ तूला, सुमिरत सकल सुमंगल मूला ||
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस, तीरथ आवाहन सुरसरि जस ||
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते, बोले गुर सन राम पिरीते ||
नाथ लोग सब निपट दुखारी, कंद मूल फल अंबु अहारी ||
सानुज भरतु सचिव सब माता, देखि मोहि पल जिमि जुग जाता ||
सब समेत पुर धारिअ पाऊ, आपु इहाँ अमरावति राऊ ||
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई, उचित होइ तस करिअ गोसाँई ||

दो -धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम, 
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम ||२४८ ||

राम बचन सुनि सभय समाजू, जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू ||
सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला, भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला ||
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं, जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं ||
मंगलमूरति लोचन भरि भरि, निरखहिं हरषि दंडवत करि करि ||
राम सैल बन देखन जाहीं, जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं ||
झरना झरिहिं सुधासम बारी, त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी ||
बिटप बेलि तृन अगनित जाती, फल प्रसून पल्लव बहु भाँती ||
सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं, जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं ||

दो -सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग, 
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग ||२४९ ||

कोल किरात भिल्ल बनबासी, मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी ||
भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी, कंद मूल फल अंकुर जूरी ||
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा, कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ||
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं, फेरत राम दोहाई देहीं ||
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी, मानत साधु पेम पहिचानी ||
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा, पावा दरसनु राम प्रसादा ||
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा, जस मरु धरनि देवधुनि धारा ||
राम कृपाल निषाद नेवाजा, परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ||

दो -यह जिँयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु, 
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु ||२५० ||

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे, सेवा जोगु न भाग हमारे ||
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई, ईधनु पात किरात मिताई ||
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई, लेहि न बासन बसन चोराई ||
हम जड़ जीव जीव गन घाती, कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ||
पाप करत निसि बासर जाहीं, नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं ||
सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ, यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ ||
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे, मिटे दुसह दुख दोष हमारे ||
बचन सुनत पुरजन अनुरागे, तिन्ह के भाग सराहन लागे ||

छं -लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं, 
बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं ||
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा, 
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा ||

सो -बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब, 
जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम ||२५१ ||

चौ॰-पुर जन नारि मगन अति प्रीती, बासर जाहिं पलक सम बीती ||
सीय सासु प्रति बेष बनाई, सादर करइ सरिस सेवकाई ||
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ, माया सब सिय माया माहूँ ||
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं, तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं ||
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई, कुटिल रानि पछितानि अघाई ||
अवनि जमहि जाचति कैकेई, महि न बीचु बिधि मीचु न देई ||
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं, राम बिमुख थलु नरक न लहहीं ||
यहु संसउ सब के मन माहीं, राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं ||

दो -निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच, 
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच ||२५२ ||

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली, ईति भीति जस पाकत साली ||
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू, मोहि अवकलत उपाउ न एकू ||
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी, मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी ||
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ, राम जननि हठ करबि कि काऊ ||
मोहि अनुचर कर केतिक बाता, तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ||
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू, हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ||
एकउ जुगुति न मन ठहरानी, सोचत भरतहि रैनि बिहानी ||
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई, बैठत पठए रिषयँ बोलाई ||

दो -गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ, 
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ||२५३ ||

बोले मुनिबरु समय समाना, सुनहु सभासद भरत सुजाना ||
धरम धुरीन भानुकुल भानू, राजा रामु स्वबस भगवानू ||
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू, राम जनमु जग मंगल हेतू ||
गुर पितु मातु बचन अनुसारी, खल दलु दलन देव हितकारी ||
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु, कोउ न राम सम जान जथारथु ||
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला, माया जीव करम कुलि काला ||
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई, जोग सिद्धि निगमागम गाई ||
करि बिचार जिँयँ देखहु नीकें, राम रजाइ सीस सबही कें ||

दो -राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ, 
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ ||२५४ ||

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू, मंगल मोद मूल मग एकू ||
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ, कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ ||
सब सादर सुनि मुनिबर बानी, नय परमारथ स्वारथ सानी ||
उतरु न आव लोग भए भोरे, तब सिरु नाइ भरत कर जोरे ||
भानुबंस भए भूप घनेरे, अधिक एक तें एक बड़ेरे ||
जनमु हेतु सब कहँ पितु माता, करम सुभासुभ देइ बिधाता ||
दलि दुख सजइ सकल कल्याना, अस असीस राउरि जगु जाना ||
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी, सकइ को टारि टेक जो टेकी ||

दो -बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु, 
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु ||२५५ ||

तात बात फुरि राम कृपाहीं, राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ||
सकुचउँ तात कहत एक बाता, अरध तजहिं बुध सरबस जाता ||
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई, फेरिअहिं लखन सीय रघुराई ||
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता, भे प्रमोद परिपूरन गाता ||
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा, जनु जिय राउ रामु भए राजा ||
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी, सम दुख सुख सब रोवहिं रानी ||
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे, फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे ||
कानन करउँ जनम भरि बासू, एहिं तें अधिक न मोर सुपासू ||

दो -अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान, 
जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान ||२५६ ||

भरत बचन सुनि देखि सनेहू, सभा सहित मुनि भए बिदेहू ||
भरत महा महिमा जलरासी, मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी ||
गा चह पार जतनु हियँ हेरा, पावति नाव न बोहितु बेरा ||
औरु करिहि को भरत बड़ाई, सरसी सीपि कि सिंधु समाई ||
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए, सहित समाज राम पहिँ आए ||
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु, बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु ||
बोले मुनिबरु बचन बिचारी, देस काल अवसर अनुहारी ||
सुनहु राम सरबग्य सुजाना, धरम नीति गुन ग्यान निधाना ||

दो -सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ, 
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ ||२५७ ||

आरत कहहिं बिचारि न काऊ, सूझ जूआरिहि आपन दाऊ ||
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ, नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ||
सब कर हित रुख राउरि राखेँ, आयसु किएँ मुदित फुर भाषें ||
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई, माथेँ मानि करौ सिख सोई ||
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईँ, सो सब भाँति घटिहि सेवकाईँ ||
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा, भरत सनेहँ बिचारु न राखा ||
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी, भरत भगति बस भइ मति मोरी ||
मोरेँ जान भरत रुचि राखि, जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी ||

दो -भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि, 
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि ||२५८ ||

गुरु अनुराग भरत पर देखी, राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी ||
भरतहि धरम धुरंधर जानी, निज सेवक तन मानस बानी ||
बोले गुर आयस अनुकूला, बचन मंजु मृदु मंगलमूला ||
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई, भयउ न भुअन भरत सम भाई ||
जे गुर पद अंबुज अनुरागी, ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ||
राउर जा पर अस अनुरागू, को कहि सकइ भरत कर भागू ||
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई, करत बदन पर भरत बड़ाई ||
भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई, अस कहि राम रहे अरगाई ||

दो -तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात, 
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात ||२५९ ||

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई, गुरु साहिब अनुकूल अघाई ||
लखि अपने सिर सबु छरु भारू, कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू ||
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें, नीरज नयन नेह जल बाढ़ें ||
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा, एहि तें अधिक कहौं मैं काहा, 
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ, अपराधिहु पर कोह न काऊ ||
मो पर कृपा सनेह बिसेषी, खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ||
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू, कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ||
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही, हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ||

दो -महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन, 
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ||२६० ||

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा, नीच बीचु जननी मिस पारा, 
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा, अपनीं समुझि साधु सुचि को भा ||
मातु मंदि मैं साधु सुचाली, उर अस आनत कोटि कुचाली ||
फरइ कि कोदव बालि सुसाली, मुकुता प्रसव कि संबुक काली ||
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू, मोर अभाग उदधि अवगाहू ||
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू, जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ||
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा, एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ||
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू, लागत मोहि नीक परिनामू ||

दो -साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ, 
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ ||२६१ ||

भूपति मरन पेम पनु राखी, जननी कुमति जगतु सबु साखी ||
देखि न जाहि बिकल महतारी, जरहिं दुसह जर पुर नर नारी ||
महीं सकल अनरथ कर मूला, सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला ||
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा, करि मुनि बेष लखन सिय साथा ||
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ, संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ ||
बहुरि निहार निषाद सनेहू, कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू ||
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई, जिअत जीव जड़ सबइ सहाई ||
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी, तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी ||

दो -तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि, 
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ||२६२ ||

सुनि अति बिकल भरत बर बानी, आरति प्रीति बिनय नय सानी ||
सोक मगन सब सभाँ खभारू, मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू ||
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी, भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी ||
बोले उचित बचन रघुनंदू, दिनकर कुल कैरव बन चंदू ||
तात जाँय जियँ करहु गलानी, ईस अधीन जीव गति जानी ||
तीनि काल तिभुअन मत मोरें, पुन्यसिलोक तात तर तोरे ||
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई, जाइ लोकु परलोकु नसाई ||
दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई, जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ||

दो -मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार, 
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार ||२६३ ||

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी, भरत भूमि रह राउरि राखी ||
तात कुतरक करहु जनि जाएँ, बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ ||
मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं, बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ||
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना, मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ||
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें, करौं काह असमंजस जीकें ||
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी, तनु परिहरेउ पेम पन लागी ||
तासु बचन मेटत मन सोचू, तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू ||
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा, अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ||

दो -मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु, 
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ||२६४ ||

सुर गन सहित सभय सुरराजू, सोचहिं चाहत होन अकाजू ||
बनत उपाउ करत कछु नाहीं, राम सरन सब गे मन माहीं ||
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं, रघुपति भगत भगति बस अहहीं, 
सुधि करि अंबरीष दुरबासा, भे सुर सुरपति निपट निरासा ||
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा, नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ||
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा, अब सुर काज भरत के हाथा ||
आन उपाउ न देखिअ देवा, मानत रामु सुसेवक सेवा ||
हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि, निज गुन सील राम बस करतहि ||

दो -सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु, 
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ||२६५ ||

सीतापति सेवक सेवकाई, कामधेनु सय सरिस सुहाई ||
भरत भगति तुम्हरें मन आई, तजहु सोचु बिधि बात बनाई ||
देखु देवपति भरत प्रभाऊ, सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ ||
मन थिर करहु देव डरु नाहीं, भरतहि जानि राम परिछाहीं ||
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू, अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ||
निज सिर भारु भरत जियँ जाना, करत कोटि बिधि उर अनुमाना ||
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका, राम रजायस आपन नीका ||
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा, छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ||

दो -कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ, 
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ||२६६ ||

कहौं कहावौं का अब स्वामी, कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ||
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला, मिटी मलिन मन कलपित सूला ||
अपडर डरेउँ न सोच समूलें, रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें ||
मोर अभागु मातु कुटिलाई, बिधि गति बिषम काल कठिनाई ||
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला, प्रनतपाल पन आपन पाला ||
यह नइ रीति न राउरि होई, लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ||
जगु अनभल भल एकु गोसाईं, कहिअ होइ भल कासु भलाईं ||
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ, सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ||

दो -जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच, 
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच ||२६७ ||

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू, मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ||
अब करुनाकर कीजिअ सोई, जन हित प्रभु चित छोभु न होई ||
जो सेवकु साहिबहि सँकोची, निज हित चहइ तासु मति पोची ||
सेवक हित साहिब सेवकाई, करै सकल सुख लोभ बिहाई ||
स्वारथु नाथ फिरें सबही का, किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका ||
यह स्वारथ परमारथ सारु, सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु ||
देव एक बिनती सुनि मोरी, उचित होइ तस करब बहोरी ||
तिलक समाजु साजि सबु आना, करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना ||

दो -सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ, 
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ ||२६८ ||

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई, बहुरिअ सीय सहित रघुराई ||
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई, करुना सागर कीजिअ सोई ||
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु, मोरें नीति न धरम बिचारु ||
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू, रहत न आरत कें चित चेतू ||
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई, सो सेवकु लखि लाज लजाई ||
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू, स्वामि सनेहँ सराहत साधू ||
अब कृपाल मोहि सो मत भावा, सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा ||
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ, जग मंगल हित एक उपाऊ ||

दो -प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब, 
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ||२६९ ||

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे, साधु सराहि सुमन सुर बरषे ||
असमंजस बस अवध नेवासी, प्रमुदित मन तापस बनबासी ||
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची, प्रभु गति देखि सभा सब सोची ||
जनक दूत तेहि अवसर आए, मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए ||
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे, बेषु देखि भए निपट दुखारे ||
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता, कहहु बिदेह भूप कुसलाता ||
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा, बोले चर बर जोरें हाथा ||
बूझब राउर सादर साईं, कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं ||

दो -नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ, 
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ ||२७० ||

कोसलपति गति सुनि जनकौरा, भे सब लोक सोक बस बौरा ||
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू, नामु सत्य अस लाग न केहू ||
रानि कुचालि सुनत नरपालहि, सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ||
भरत राज रघुबर बनबासू, भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू ||
नृप बूझे बुध सचिव समाजू, कहहु बिचारि उचित का आजू ||
समुझि अवध असमंजस दोऊ, चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ ||
नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी, पठए अवध चतुर चर चारी ||
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ, आएहु बेगि न होइ लखाऊ ||

दो -गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति, 
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति ||२७१ ||

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी, जनक समाज जथामति बरनी ||
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति, भे सब सोच सनेहँ बिकल अति ||
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई, लिए सुभट साहनी बोलाई ||
घर पुर देस राखि रखवारे, हय गय रथ बहु जान सँवारे ||
दुघरी साधि चले ततकाला, किए बिश्रामु न मग महीपाला ||
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा, चले जमुन उतरन सबु लागा ||
खबरि लेन हम पठए नाथा, तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ||
साथ किरात छ सातक दीन्हे, मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ||

दो -सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु, 
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ||२७२ ||

गरइ गलानि कुटिल कैकेई, काहि कहै केहि दूषनु देई ||
अस मन आनि मुदित नर नारी, भयउ बहोरि रहब दिन चारी ||
एहि प्रकार गत बासर सोऊ, प्रात नहान लाग सबु कोऊ ||
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी, गनप गौरि तिपुरारि तमारी ||
रमा रमन पद बंदि बहोरी, बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ||
राजा रामु जानकी रानी, आनँद अवधि अवध रजधानी ||
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा, भरतहि रामु करहुँ जुबराजा ||
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू, देव देहु जग जीवन लाहू ||

दो -गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ, 
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ||२७३ ||

सुनि सनेहमय पुरजन बानी, निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी ||
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन, रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन ||
ऊँच नीच मध्यम नर नारी, लहहिं दरसु निज निज अनुहारी ||
सावधान सबही सनमानहिं, सकल सराहत कृपानिधानहिं ||
लरिकाइहि ते रघुबर बानी, पालत नीति प्रीति पहिचानी ||
सील सकोच सिंधु रघुराऊ, सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ||
कहत राम गुन गन अनुरागे, सब निज भाग सराहन लागे ||
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे, जिन्हहि रामु जानत करि मोरे ||

दो -प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु, 
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु ||२७४ ||

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा, आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा ||
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं, करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं ||
राम दरस लालसा उछाहू, पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ||
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही, बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ||
आवत जनकु चले एहि भाँती, सहित समाज प्रेम मति माती ||
आए निकट देखि अनुरागे, सादर मिलन परसपर लागे ||
लगे जनक मुनिजन पद बंदन, रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ||
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि, चले लवाइ समेत समाजहि ||

दो -आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु, 
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ||२७५ ||

बोरति ग्यान बिराग करारे, बचन ससोक मिलत नद नारे ||
सोच उसास समीर तंरगा, धीरज तट तरुबर कर भंगा ||
बिषम बिषाद तोरावति धारा, भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ||
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा, सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा ||
बनचर कोल किरात बिचारे, थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ||
आश्रम उदधि मिली जब जाई, मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई ||
सोक बिकल दोउ राज समाजा, रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा ||
भूप रूप गुन सील सराही, रोवहिं सोक सिंधु अवगाही ||

छं -अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा, 
दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा ||
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की, 
तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की ||

सो -किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह, 
धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन ||२७६ ||

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा, बचन किरन मुनि कमल बिकासा ||
तेहि कि मोह ममता निअराई, यह सिय राम सनेह बड़ाई ||
बिषई साधक सिद्ध सयाने, त्रिबिध जीव जग बेद बखाने ||
राम सनेह सरस मन जासू, साधु सभाँ बड़ आदर तासू ||
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू, करनधार बिनु जिमि जलजानू ||
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए, रामघाट सब लोग नहाए ||
सकल सोक संकुल नर नारी, सो बासरु बीतेउ बिनु बारी ||
पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू, प्रिय परिजन कर कौन बिचारू ||

दो -दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात, 
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात ||२७७ ||

जे महिसुर दसरथ पुर बासी, जे मिथिलापति नगर निवासी ||
हंस बंस गुर जनक पुरोधा, जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा ||
लगे कहन उपदेस अनेका, सहित धरम नय बिरति बिबेका ||
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं, समुझाई सब सभा सुबानीं ||
तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ, नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ ||
मुनि कह उचित कहत रघुराई, गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई ||
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू, इहाँ उचित नहिं असन अनाजू ||
कहा भूप भल सबहि सोहाना, पाइ रजायसु चले नहाना ||

दो -तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार, 
लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार ||२७८ ||

कामद मे गिरि राम प्रसादा, अवलोकत अपहरत बिषादा ||
सर सरिता बन भूमि बिभागा, जनु उमगत आनँद अनुरागा ||
बेलि बिटप सब सफल सफूला, बोलत खग मृग अलि अनुकूला ||
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू, त्रिबिध समीर सुखद सब काहू ||
जाइ न बरनि मनोहरताई, जनु महि करति जनक पहुनाई ||
तब सब लोग नहाइ नहाई, राम जनक मुनि आयसु पाई ||
देखि देखि तरुबर अनुरागे, जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे ||
दल फल मूल कंद बिधि नाना, पावन सुंदर सुधा समाना ||

दो -सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार, 
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार ||२७९ ||

एहि बिधि बासर बीते चारी, रामु निरखि नर नारि सुखारी ||
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं, बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं ||
सीता राम संग बनबासू, कोटि अमरपुर सरिस सुपासू ||
परिहरि लखन रामु बैदेही, जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही ||
दाहिन दइउ होइ जब सबही, राम समीप बसिअ बन तबही ||
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला, राम दरसु मुद मंगल माला ||
अटनु राम गिरि बन तापस थल, असनु अमिअ सम कंद मूल फल ||
सुख समेत संबत दुइ साता, पल सम होहिं न जनिअहिं जाता ||

दो -एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु ||
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु ||२८० ||

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं, बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं ||
सीय मातु तेहि समय पठाईं, दासीं देखि सुअवसरु आईं ||
सावकास सुनि सब सिय सासू, आयउ जनकराज रनिवासू ||
कौसल्याँ सादर सनमानी, आसन दिए समय सम आनी ||
सीलु सनेह सकल दुहु ओरा, द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा ||
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन, महि नख लिखन लगीं सब सोचन ||
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती, जनु करुना बहु बेष बिसूरति ||
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी, जो पय फेनु फोर पबि टाँकी ||

दो -सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल, 
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ||२८१ ||

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा, बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा ||
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी, बाल केलि सम बिधि मति भोरी ||
कौसल्या कह दोसु न काहू, करम बिबस दुख सुख छति लाहू ||
कठिन करम गति जान बिधाता, जो सुभ असुभ सकल फल दाता ||
ईस रजाइ सीस सबही कें, उतपति थिति लय बिषहु अमी कें ||
देबि मोह बस सोचिअ बादी, बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी ||
भूपति जिअब मरब उर आनी, सोचिअ सखि लखि निज हित हानी ||
सीय मातु कह सत्य सुबानी, सुकृती अवधि अवधपति रानी ||

दो -लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु, 
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु ||२८२ ||

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी, सुत सुतबधू देवसरि बारी ||
राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ, सो करि कहउँ सखी सति भाऊ ||
भरत सील गुन बिनय बड़ाई, भायप भगति भरोस भलाई ||
कहत सारदहु कर मति हीचे, सागर सीप कि जाहिं उलीचे ||
जानउँ सदा भरत कुलदीपा, बार बार मोहि कहेउ महीपा ||
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ, पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ, 
अनुचित आजु कहब अस मोरा, सोक सनेहँ सयानप थोरा ||
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी, भईं सनेह बिकल सब रानी ||

दो -कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि, 
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि ||२८३ ||

रानि राय सन अवसरु पाई, अपनी भाँति कहब समुझाई ||
रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन, जौं यह मत मानै महीप मन ||
तौ भल जतनु करब सुबिचारी, मोरें सौचु भरत कर भारी ||
गूढ़ सनेह भरत मन माही, रहें नीक मोहि लागत नाहीं ||
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी, सब भइ मगन करुन रस रानी ||
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि, सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि ||
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ, तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ ||
देबि दंड जुग जामिनि बीती, राम मातु सुनी उठी सप्रीती ||

दो -बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय, 
हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय ||२८४ ||

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता, जनकप्रिया गह पाय पुनीता ||
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी, दसरथ घरिनि राम महतारी ||
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं, अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं ||
सेवकु राउ करम मन बानी, सदा सहाय महेसु भवानी ||
रउरे अंग जोगु जग को है, दीप सहाय कि दिनकर सोहै ||
रामु जाइ बनु करि सुर काजू, अचल अवधपुर करिहहिं राजू ||
अमर नाग नर राम बाहुबल, सुख बसिहहिं अपनें अपने थल ||
यह सब जागबलिक कहि राखा, देबि न होइ मुधा मुनि भाषा ||

दो -अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ ||
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ ||२८५ ||

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही, जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही ||
तापस बेष जानकी देखी, भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी ||
जनक राम गुर आयसु पाई, चले थलहि सिय देखी आई ||
लीन्हि लाइ उर जनक जानकी, पाहुन पावन पेम प्रान की ||
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू, भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू ||
सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा, ता पर राम पेम सिसु सोहा ||
चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु, बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु ||
मोह मगन मति नहिं बिदेह की, महिमा सिय रघुबर सनेह की ||

दो -सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि, 
धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि ||२८६ ||

तापस बेष जनक सिय देखी, भयउ पेमु परितोषु बिसेषी ||
पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ, सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ ||
जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी, गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी ||
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे, एहिं किए साधु समाज घनेरे ||
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी, सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी ||
पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई, सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई ||
कहति न सीय सकुचि मन माहीं, इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं ||
लखि रुख रानि जनायउ राऊ, हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ ||

दो -बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि, 
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि ||२८७ ||

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू, सोन सुगंध सुधा ससि सारू ||
मूदे सजल नयन पुलके तन, सुजसु सराहन लगे मुदित मन ||
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि, भरत कथा भव बंध बिमोचनि ||
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू, इहाँ जथामति मोर प्रचारू ||
सो मति मोरि भरत महिमाही, कहै काह छलि छुअति न छाँही ||
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद, कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद ||
भरत चरित कीरति करतूती, धरम सील गुन बिमल बिभूती ||
समुझत सुनत सुखद सब काहू, सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ||

दो -निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि, 
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि ||२८८ ||

अगम सबहि बरनत बरबरनी, जिमि जलहीन मीन गमु धरनी ||
भरत अमित महिमा सुनु रानी, जानहिं रामु न सकहिं बखानी ||
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ, तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ ||
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं, सब कर भल सब के मन माहीं ||
देबि परंतु भरत रघुबर की, प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ||
भरतु अवधि सनेह ममता की, जद्यपि रामु सीम समता की ||
परमारथ स्वारथ सुख सारे, भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे ||
साधन सिद्ध राम पग नेहू ||मोहि लखि परत भरत मत एहू ||

दो -भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ, 
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ ||२८९ ||

राम भरत गुन गनत सप्रीती, निसि दंपतिहि पलक सम बीती ||
राज समाज प्रात जुग जागे, न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे ||
गे नहाइ गुर पहीं रघुराई, बंदि चरन बोले रुख पाई ||
नाथ भरतु पुरजन महतारी, सोक बिकल बनबास दुखारी ||
सहित समाज राउ मिथिलेसू, बहुत दिवस भए सहत कलेसू ||
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा, हित सबही कर रौरें हाथा ||
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ, मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ ||
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा, नरक सरिस दुहु राज समाजा ||

दो -प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम, 
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम ||२९० ||

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ, जहँ न राम पद पंकज भाऊ ||
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू, जहँ नहिं राम पेम परधानू ||
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं, तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं ||
राउर आयसु सिर सबही कें, बिदित कृपालहि गति सब नीकें ||
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ, भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ ||
करि प्रनाम तब रामु सिधाए, रिषि धरि धीर जनक पहिं आए ||
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए, सील सनेह सुभायँ सुहाए ||
महाराज अब कीजिअ सोई, सब कर धरम सहित हित होई,

दो -ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल, 
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ||२९१ ||

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे, लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे ||
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं, आए इहाँ कीन्ह भल नाही ||
रामहि रायँ कहेउ बन जाना, कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ||
हम अब बन तें बनहि पठाई, प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई ||
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी, भए प्रेम बस बिकल बिसेषी ||
समउ समुझि धरि धीरजु राजा, चले भरत पहिं सहित समाजा ||
भरत आइ आगें भइ लीन्हे, अवसर सरिस सुआसन दीन्हे ||
तात भरत कह तेरहुति राऊ, तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ ||

दो -राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ||
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ||२९२ ||

 

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी, बोले भरतु धीर धरि भारी ||
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू, कुलगुरु सम हित माय न बापू ||
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू, ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू ||
सिसु सेवक आयसु अनुगामी, जानि मोहि सिख देइअ स्वामी ||
एहिं समाज थल बूझब राउर, मौन मलिन मैं बोलब बाउर ||
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता, छमब तात लखि बाम बिधाता ||
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना, सेवाधरमु कठिन जगु जाना ||
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू, बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू ||

दो -राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि, 
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि ||२९३ ||

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ, सहित समाज सराहत राऊ ||
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे, अरथु अमित अति आखर थोरे ||
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी, गहि न जाइ अस अदभुत बानी ||
भूप भरत मुनि सहित समाजू, गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू ||
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा, मनहुँ मीनगन नव जल जोगा ||
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी, निरखि बिदेह सनेह बिसेषी ||
राम भगतिमय भरतु निहारे, सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ||
सब कोउ राम पेममय पेखा, भउ अलेख सोच बस लेखा ||

दो -रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज, 
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ||२९४ ||

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही, देबि देव सरनागत पाही ||
फेरि भरत मति करि निज माया, पालु बिबुध कुल करि छल छाया ||
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी, बोली सुर स्वारथ जड़ जानी ||
मो सन कहहु भरत मति फेरू, लोचन सहस न सूझ सुमेरू ||
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी, सोउ न भरत मति सकइ निहारी ||
सो मति मोहि कहत करु भोरी, चंदिनि कर कि चंडकर चोरी ||
भरत हृदयँ सिय राम निवासू, तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू ||
अस कहि सारद गइ बिधि लोका, बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका ||

दो -सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु ||
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु ||२९५ ||

करि कुचालि सोचत सुरराजू, भरत हाथ सबु काजु अकाजू ||
गए जनकु रघुनाथ समीपा, सनमाने सब रबिकुल दीपा ||
समय समाज धरम अबिरोधा, बोले तब रघुबंस पुरोधा ||
जनक भरत संबादु सुनाई, भरत कहाउति कही सुहाई ||
तात राम जस आयसु देहू, सो सबु करै मोर मत एहू ||
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी, बोले सत्य सरल मृदु बानी ||
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू, मोर कहब सब भाँति भदेसू ||
राउर राय रजायसु होई, राउरि सपथ सही सिर सोई ||

दो -राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत, 
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत ||२९६ ||

सभा सकुच बस भरत निहारी, रामबंधु धरि धीरजु भारी ||
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा, बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा ||
सोक कनकलोचन मति छोनी, हरी बिमल गुन गन जगजोनी ||
भरत बिबेक बराहँ बिसाला, अनायास उधरी तेहि काला ||
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे, रामु राउ गुर साधु निहोरे ||
छमब आजु अति अनुचित मोरा, कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ||
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई, मानस तें मुख पंकज आई ||
बिमल बिबेक धरम नय साली, भरत भारती मंजु मराली ||

दो -निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु, 
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ||२९७ ||

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी, पूज्य परम हित अतंरजामी ||
सरल सुसाहिबु सील निधानू, प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ||
समरथ सरनागत हितकारी, गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ||
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई, मोहि समान मैं साइँ दोहाई ||
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली, आयउँ इहाँ समाजु सकेली ||
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू, अमिअ अमरपद माहुरु मीचू ||
राम रजाइ मेट मन माहीं, देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ||
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई, प्रभु मानी सनेह सेवकाई ||

दो -
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर, 
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर ||२९८ ||

राउरि रीति सुबानि बड़ाई, जगत बिदित निगमागम गाई ||
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी, नीच निसील निरीस निसंकी ||
तेउ सुनि सरन सामुहें आए, सकृत प्रनामु किहें अपनाए ||
देखि दोष कबहुँ न उर आने, सुनि गुन साधु समाज बखाने ||
को साहिब सेवकहि नेवाजी, आपु समाज साज सब साजी ||
निज करतूति न समुझिअ सपनें, सेवक सकुच सोचु उर अपनें ||
सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी, भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ||
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना, गुन गति नट पाठक आधीना ||

दो -यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर, 
को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर ||२९९ ||

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ, आयउँ लाइ रजायसु बाएँ ||
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा, सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ||
देखेउँ पाय सुमंगल मूला, जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ||
बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू, बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ||
कृपा अनुग्रह अंगु अघाई, कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई ||
राखा मोर दुलार गोसाईं, अपनें सील सुभायँ भलाईं ||
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई, स्वामि समाज सकोच बिहाई ||
अबिनय बिनय जथारुचि बानी, छमिहि देउ अति आरति जानी ||

दो -
सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि, 
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि ||३०० ||

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई, सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ||
सो करि कहउँ हिए अपने की, रुचि जागत सोवत सपने की ||
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई, स्वारथ छल फल चारि बिहाई ||
अग्या सम न सुसाहिब सेवा, सो प्रसादु जन पावै देवा ||
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी, पुलक सरीर बिलोचन बारी ||
प्रभु पद कमल गहे अकुलाई, समउ सनेहु न सो कहि जाई ||
कृपासिंधु सनमानि सुबानी, बैठाए समीप गहि पानी ||
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ, सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ||

छं -रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी, 
मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ||
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से, 
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ||

सो -देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब, 
मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत ||३०१ ||

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू, पर अकाज प्रिय आपन काजू ||
काक समान पाकरिपु रीती, छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ||
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला, सो उचाटु सब कें सिर मेला ||
सुरमायाँ सब लोग बिमोहे, राम प्रेम अतिसय न बिछोहे ||
भय उचाट बस मन थिर नाहीं, छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं ||
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी, सरित सिंधु संगम जनु बारी ||
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं, एक एक सन मरमु न कहहीं ||
लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू, सरिस स्वान मघवान जुबानू ||

दो -भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ, 
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ ||३०२ ||

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे, निज सनेहँ सुरपति छल भारे ||
सभा राउ गुर महिसुर मंत्री, भरत भगति सब कै मति जंत्री ||
रामहि चितवत चित्र लिखे से, सकुचत बोलत बचन सिखे से ||
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई, सुनत सुखद बरनत कठिनाई ||
जासु बिलोकि भगति लवलेसू, प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू ||
महिमा तासु कहै किमि तुलसी, भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी ||
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी, कबिकुल कानि मानि सकुचानी ||
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई, मति गति बाल बचन की नाई ||

दो -भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि, 
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि ||३०३ ||

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ, लघु मति चापलता कबि छमहूँ ||
कहत सुनत सति भाउ भरत को, सीय राम पद होइ न रत को ||
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को, जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को ||
देखि दयाल दसा सबही की, राम सुजान जानि जन जी की ||
धरम धुरीन धीर नय नागर, सत्य सनेह सील सुख सागर ||
देसु काल लखि समउ समाजू, नीति प्रीति पालक रघुराजू ||
बोले बचन बानि सरबसु से, हित परिनाम सुनत ससि रसु से ||
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना, लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ||

दो -करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात, 
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ||३०४ ||

जानहु तात तरनि कुल रीती, सत्यसंध पितु कीरति प्रीती ||
समउ समाजु लाज गुरुजन की, उदासीन हित अनहित मन की ||
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू, आपन मोर परम हित धरमू ||
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा, तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ||
तात तात बिनु बात हमारी, केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी ||
नतरु प्रजा परिजन परिवारू, हमहि सहित सबु होत खुआरू ||
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू, जग केहि कहहु न होइ कलेसू ||
तस उतपातु तात बिधि कीन्हा, मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा ||

दो -राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम, 
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ||३०५ ||

सहित समाज तुम्हार हमारा, घर बन गुर प्रसाद रखवारा ||
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू, सकल धरम धरनीधर सेसू ||
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू, तात तरनिकुल पालक होहू ||
साधक एक सकल सिधि देनी, कीरति सुगति भूतिमय बेनी ||
सो बिचारि सहि संकटु भारी, करहु प्रजा परिवारु सुखारी ||
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई, तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई ||
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा, कुसमयँ तात न अनुचित मोरा ||
होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए, ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए ||

दो -सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ, 
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ||३०६ ||

सभा सकल सुनि रघुबर बानी, प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी ||
सिथिल समाज सनेह समाधी, देखि दसा चुप सारद साधी ||
भरतहि भयउ परम संतोषू, सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू ||
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू, भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू ||
कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी, बोले पानि पंकरुह जोरी ||
नाथ भयउ सुखु साथ गए को, लहेउँ लाहु जग जनमु भए को ||
अब कृपाल जस आयसु होई, करौं सीस धरि सादर सोई ||
सो अवलंब देव मोहि देई, अवधि पारु पावौं जेहि सेई ||

दो -देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ, 
आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ ||३०७ ||

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं, सभयँ सकोच जात कहि नाहीं ||
कहहु तात प्रभु आयसु पाई, बोले बानि सनेह सुहाई ||
चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन, खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ||
प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी, आयसु होइ त आवौं देखी ||
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू, तात बिगतभय कानन चरहू ||
मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता, पावन परम सुहावन भ्राता ||
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं, राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं ||
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा, मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा ||

दो -भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल, 
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल ||३०८ ||

धन्य भरत जय राम गोसाईं, कहत देव हरषत बरिआई, 
मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू, भरत बचन सुनि भयउ उछाहू ||
भरत राम गुन ग्राम सनेहू, पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ||
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन, नेमु पेमु अति पावन पावन ||
मति अनुसार सराहन लागे, सचिव सभासद सब अनुरागे ||
सुनि सुनि राम भरत संबादू, दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू ||
राम मातु दुखु सुखु सम जानी, कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ||
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई, एक सराहत भरत भलाई ||

दो -अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप, 
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप ||३०९ ||

भरत अत्रि अनुसासन पाई, जल भाजन सब दिए चलाई ||
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू, सहित गए जहँ कूप अगाधू ||
पावन पाथ पुन्यथल राखा, प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा ||
तात अनादि सिद्ध थल एहू, लोपेउ काल बिदित नहिं केहू ||
तब सेवकन्ह सरस थलु देखा, किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा ||
बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू, सुगम अगम अति धरम बिचारू ||
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा, अति पावन तीरथ जल जोगा ||
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी, होइहहिं बिमल करम मन बानी ||

दो -कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ, 
अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ ||३१० ||

कहत धरम इतिहास सप्रीती, भयउ भोरु निसि सो सुख बीती ||
नित्य निबाहि भरत दोउ भाई, राम अत्रि गुर आयसु पाई ||
सहित समाज साज सब सादें, चले राम बन अटन पयादें ||
कोमल चरन चलत बिनु पनहीं, भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं ||
कुस कंटक काँकरीं कुराईं, कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं ||
महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे, बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे ||
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं, बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं ||
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी, सेवहिं सकल राम प्रिय जानी ||

दो -सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात, 
राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात ||३११ ||

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं, नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं ||
पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा, खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा ||
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी, बूझत भरतु दिब्य सब देखी ||
सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ, हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ ||
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा, कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा ||
कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई, सुमिरत सीय सहित दोउ भाई ||
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा, देहिं असीस मुदित बनदेवा ||
फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई, प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई ||

दो -देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ, 
कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ ||३१२ ||

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू, भरत भूमिसुर तेरहुति राजू ||
भल दिन आजु जानि मन माहीं, रामु कृपाल कहत सकुचाहीं ||
गुर नृप भरत सभा अवलोकी, सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी ||
सील सराहि सभा सब सोची, कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची ||
भरत सुजान राम रुख देखी, उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी ||
करि दंडवत कहत कर जोरी, राखीं नाथ सकल रुचि मोरी ||
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू, बहुत भाँति दुखु पावा आपू ||
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई, सेवौं अवध अवधि भरि जाई ||

दो -जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल, 
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ||३१३ ||

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई, सब सुचि सरस सनेहँ सगाई ||
राउर बदि भल भव दुख दाहू, प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ||
स्वामि सुजानु जानि सब ही की, रुचि लालसा रहनि जन जी की ||
प्रनतपालु पालिहि सब काहू, देउ दुहू दिसि ओर निबाहू ||
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो, किएँ बिचारु न सोचु खरो सो ||
आरति मोर नाथ कर छोहू, दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू ||
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी, तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ||
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी, खीर नीर बिबरन गति हंसी ||

दो -दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन, 
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन ||३१४ ||

तात तुम्हारि मोरि परिजन की, चिंता गुरहि नृपहि घर बन की ||
माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू, हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू ||
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु, स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु ||
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई, लोक बेद भल भूप भलाई ||
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें, चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ||
अस बिचारि सब सोच बिहाई, पालहु अवध अवधि भरि जाई ||
देसु कोसु परिजन परिवारू, गुर पद रजहिं लाग छरुभारू ||
तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी, पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी ||

दो -मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक, 
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ||३१५ ||

राजधरम सरबसु एतनोई, जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ||
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती, बिनु अधार मन तोषु न साँती ||
भरत सील गुर सचिव समाजू, सकुच सनेह बिबस रघुराजू ||
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं, सादर भरत सीस धरि लीन्हीं ||
चरनपीठ करुनानिधान के, जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के ||
संपुट भरत सनेह रतन के, आखर जुग जुन जीव जतन के ||
कुल कपाट कर कुसल करम के, बिमल नयन सेवा सुधरम के ||
भरत मुदित अवलंब लहे तें, अस सुख जस सिय रामु रहे तें ||

दो -मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ, 
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ ||३१६ ||

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी, अवधि आस सम जीवनि जी की ||
नतरु लखन सिय सम बियोगा, हहरि मरत सब लोग कुरोगा ||
रामकृपाँ अवरेब सुधारी, बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ||
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो, राम प्रेम रसु कहि न परत सो ||
तन मन बचन उमग अनुरागा, धीर धुरंधर धीरजु त्यागा ||
बारिज लोचन मोचत बारी, देखि दसा सुर सभा दुखारी ||
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से, ग्यान अनल मन कसें कनक से ||
जे बिरंचि निरलेप उपाए, पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ||

दो -तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार, 
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार ||३१७ ||
जहाँ जनक गुर मति भोरी, प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ||
बरनत रघुबर भरत बियोगू, सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू ||
सो सकोच रसु अकथ सुबानी, समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी ||
भेंटि भरत रघुबर समुझाए, पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए ||
सेवक सचिव भरत रुख पाई, निज निज काज लगे सब जाई ||
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा, लगे चलन के साजन साजा ||
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई, चले सीस धरि राम रजाई ||
मुनि तापस बनदेव निहोरी, सब सनमानि बहोरि बहोरी ||

दो -लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि, 
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि ||३१८ ||

सानुज राम नृपहि सिर नाई, कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई ||
देव दया बस बड़ दुखु पायउ, सहित समाज काननहिं आयउ ||
पुर पगु धारिअ देइ असीसा, कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा ||
मुनि महिदेव साधु सनमाने, बिदा किए हरि हर सम जाने ||
सासु समीप गए दोउ भाई, फिरे बंदि पग आसिष पाई ||
कौसिक बामदेव जाबाली, पुरजन परिजन सचिव सुचाली ||
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा, बिदा किए सब सानुज रामा ||
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे, सब सनमानि कृपानिधि फेरे ||

दो -भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि, 
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि ||३१९ ||

परिजन मातु पितहि मिलि सीता, फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता ||
करि प्रनामु भेंटी सब सासू, प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू ||
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई, रही सीय दुहु प्रीति समाई ||
रघुपति पटु पालकीं मगाईं, करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई ||
बार बार हिलि मिलि दुहु भाई, सम सनेहँ जननी पहुँचाई ||
साजि बाजि गज बाहन नाना, भरत भूप दल कीन्ह पयाना ||
हृदयँ रामु सिय लखन समेता, चले जाहिं सब लोग अचेता ||
बसह बाजि गज पसु हियँ हारें, चले जाहिं परबस मन मारें ||

दो -गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत, 
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत ||३२० ||

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू, चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू ||
कोल किरात भिल्ल बनचारी, फेरे फिरे जोहारि जोहारी ||
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं, प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं ||
भरत सनेह सुभाउ सुबानी, प्रिया अनुज सन कहत बखानी ||
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी, श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी ||
तेहि अवसर खग मृग जल मीना, चित्रकूट चर अचर मलीना ||
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की, बरषि सुमन कहि गति घर घर की ||
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो, चले मुदित मन डर न खरो सो ||

दो -सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर, 
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर ||३२१ ||

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू, राम बिरहँ सबु साजु बिहालू ||
प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं, सब चुपचाप चले मग जाहीं ||
जमुना उतरि पार सबु भयऊ, सो बासरु बिनु भोजन गयऊ ||
उतरि देवसरि दूसर बासू, रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू ||
सई उतरि गोमतीं नहाए, चौथें दिवस अवधपुर आए, 
जनकु रहे पुर बासर चारी, राज काज सब साज सँभारी ||
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू, तेरहुति चले साजि सबु साजू ||
नगर नारि नर गुर सिख मानी, बसे सुखेन राम रजधानी ||

दो -राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास, 
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस ||३२२ ||

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे, निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे ||
पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई, सौंपी सकल मातु सेवकाई ||
भूसुर बोलि भरत कर जोरे, करि प्रनाम बय बिनय निहोरे ||
ऊँच नीच कारजु भल पोचू, आयसु देब न करब सँकोचू ||
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए, समाधानु करि सुबस बसाए ||
सानुज गे गुर गेहँ बहोरी, करि दंडवत कहत कर जोरी ||
आयसु होइ त रहौं सनेमा, बोले मुनि तन पुलकि सपेमा ||
समुझव कहब करब तुम्ह जोई, धरम सारु जग होइहि सोई ||

दो -सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि, 
सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि ||३२३ ||

राम मातु गुर पद सिरु नाई, प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ||
नंदिगावँ करि परन कुटीरा, कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा ||
जटाजूट सिर मुनिपट धारी, महि खनि कुस साँथरी सँवारी ||
असन बसन बासन ब्रत नेमा, करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा ||
भूषन बसन भोग सुख भूरी, मन तन बचन तजे तिन तूरी ||
अवध राजु सुर राजु सिहाई, दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ||
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा, चंचरीक जिमि चंपक बागा ||
रमा बिलासु राम अनुरागी, तजत बमन जिमि जन बड़भागी ||

दो -राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति, 
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ||३२४ ||

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई, घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ||
नित नव राम प्रेम पनु पीना, बढ़त धरम दलु मनु न मलीना ||
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे, बिलसत बेतस बनज बिकासे ||
सम दम संजम नियम उपासा, नखत भरत हिय बिमल अकासा ||
ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी, स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी ||
राम पेम बिधु अचल अदोषा, सहित समाज सोह नित चोखा ||
भरत रहनि समुझनि करतूती, भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ||
बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं, सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ||

दो -नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति ||
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति ||३२५ ||

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू, जीह नामु जप लोचन नीरू ||
लखन राम सिय कानन बसहीं, भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं ||
दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू, सब बिधि भरत सराहन जोगू ||
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं, देखि दसा मुनिराज लजाहीं ||
परम पुनीत भरत आचरनू, मधुर मंजु मुद मंगल करनू ||
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू, महामोह निसि दलन दिनेसू ||
पाप पुंज कुंजर मृगराजू, समन सकल संताप समाजू, 
जन रंजन भंजन भव भारू, राम सनेह सुधाकर सारू ||

छं -सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को, 
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को ||
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को, 
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ||

सो -भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं, 
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति ||३२६ ||

मासपारायण, इक्कीसवाँ विश्राम 
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीयः सोपानः समाप्तः,
(अयोध्याकाण्ड समाप्त)

 

 
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