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Sunday, December 10 2017
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कोकिला व्रतकथा पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल
                            

एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बडा यज्ञ किया इस यज्ञ मे सब देवताओ को आंमत्रित किया गया था परन्तु अपने दामाद भगवान शंकर को उन्होने आमत्रित नही किया जब सती को इस बात का पता चला तो उन्होने अपने पति भगवान शंकर से मायके जाने को कहा । शंकर जी ने बिना निमंत्रण वहाँ जाने से इन्कार कर दिया परन्तु जिद्द करके सती मायके चली गई मायके में पहुचकर सती का घोर अपमान व अनादर किया गया इस कारण सती प्रजापति के यज्ञ कुण्ड मे कुद कर भस्म हो गई भगवान शंकर को जब सती के भस्म होने का समाचार मिला तो वे क्रोधित हो गए उन्होने वीर भद्र को प्रजापति दक्ष के यज्ञ को खंडित करने का काम सौपा । इस विप्लव को शांत करने का प्रयास किया । भगवान आशुतोष को क्रोध शान्त हुआ परन्तु आज्ञा उल्लघंन करने वाली अपनी पत्नी सती को दस हजार वर्ष तक कोकिला पक्षी बनकर विचरण करने का श्राप दे डाला । सती कोकीला रूप में नन्दन वन में दस हजार वर्ष तक रही इसके बाद पार्वती का जन्म पाकर, आषाढ मास मे नियमित एक मास तक यह व्रत किया जिसके परिणाम स्वरूप भगवान शिव उनको पुनः पति के रूप में प्राप्त हुए। 

 

 
 
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