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Sunday, December 10 2017
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हरतालिका तीज व्रतकथा पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल
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भगवान शंकर ने पार्वती को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने हेतु। इस प्रकार कही थी - एक बार तुमने हिमालय पर गंगा तट पर अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्ष की आयु में अधोमुखी होकर घोर तप किया था। तुम्हारी कठोर तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता को बडा क्लेश होता था। एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता के क्लेश के कारण नारदजी तुम्हारे पिता के पास आये। और बोले कि विष्णु भगवान आपकी कन्या से विवाह करना चाहते है। उन्होने इस कार्य होते मुझे आफ पास भेजा है तुम्हारे पिता ने विष्णु जी के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसके बाद नादरजी ने विष्णु जी के पास जाकर कहा कि हिमालयराज अपनी पुत्री सती का विवाह आपसे करना चाहते है। विष्णु जी भी तुमसे विवाह करने को राजी हो गए। नारदजी के जाने के बाद तुम्हारे पिता ने तुम्हे बताया कि तुम्हारा विवाह विष्णुजी से तय कर दिया है। यह अनहोनी बात सुनकर तुम्हे अत्यन्त दुःख हुआ और तुम जोर जोर से विलाप करने लगी एक अंतरंग सखी के द्वारा विलाप का कारण पूछने पर तुमने सारा वृतांत सखी को बता दिया। मैं शंकर भगवान से विवाह के लिये कठोर तप कर रही हूँ । उधर हमारे पिताश्री विष्णुजी के साथ मेरा सम्बन्ध करना चाहते है। क्या तुम मेरी सहायता करोगी? नही तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी । तुम्हारी सखी बडी दूरदर्शी थी वह तुम्हे एक घनघोर जंगल म ले गयी इधर तुम्हारे पिता तुम्हे घर में न पाकर बहुत चिन्तित हुए मैं विष्णुजी से विवाह करने का वचन चूका हूँ वचन भंग की चिन्ता से वह मुर्छित हो गए । इधर तुम्हारी खोज होती रही और तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में तेरी तपस्या करने में लीन हो गई। भाद्रपद शुक्ला की तृतीया का हस्त नक्षत्र में तुमने रेत का शिवलिंग स्थापित करके व्रत किया। और पूजन तथा रात्रि जागरण भी किया तुम्हारे इस कठिन तप व्रत से मेरा आसन डोलने लगा मेरी समाधि टूट गई मैं तुरन्त तुम्हारे पास पहुँचा और वर माँगने का आदेश दिया तुम्हारी माँग तथा इच्छानुसार तुम्हे मुझे अर्धागिनी के रूप में स्वीकार करना पडा। तुम्हे वरदान देकर में कैलाश पर्वत पर चला आया प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त साम्रगी को नदी में प्रवाहीत करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारण किया उसी समय तुम्हे खोजते हुए हिमालय राज उस स्थान पर पहुच गए बिलखते हुए तुम्हारे घर छोडने का कारण पुछने लगे तब तुमने उन्हे बताया कि मैं शंकर भगवान को पति रूप में वरण कर चुकी हूँ परन्तु आप मेरा विवाह विष्णुजी से करना चाहते है इसलिए मुझे घर छोडकर आना पडा मै अब आफ साथ घर इसी शर्त पर चल सकती हूँ कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से करके भगवान शिव से करेगे गिरिराज तुम्हारी बात मान गये और शास्त्रोक्त विधि द्वारा हम दोनो का विवाह के बन्धन में बाँध दिया। इस व्रत को हस्तालिका इसलिए कहते है कि पार्वती की सखी उसे पिता के घर से ही कर घनघोर जंगल में ले गई थी ”हरत“अर्थात हरण करना और आलिका अर्थात सखी, सहेली। हरतालिका (हरत+आलिका)। शंकरजी ने पार्वती से यह भी बताया कि जो स्त्री इस व्रत को परम श्रद्धा से करेगी। उसे तुम्हारे समान ही अचल सुहाग प्राप्त होगा।

 
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