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Thursday, August 16 2018
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आँवला नवमी कथा पी.डी.एफ़ छापें ई-मेल
                                         एक सेठ आमला नौमी के दिन आँवले के पेड के नीचे ब्राह्यणो को भोजन कराया करता था । सोने का दान किया करता था। उसके बेटो को यह सब अच्छा नही लगता था। घर की कलह से तंग आकर वह घर छोडकर दुसरे गाँव से चला गया । उसने वहाँ जीवन यापन के लिए एक दुकान कर ली । उसने दूकान के आगे एक आँवले का पेड लगाया । उसकी दुकान खूब चलने लगी । वह यहा भी आँवला नवमी का व्रत करने लगी तथा ब्राह्यणो को भोजन तथा दान का कार्यक्रम चालू रखा ।
बेटो का कार्य ठप हो गया । उनकी समझ मे यह बात आ गई थी हम तो पिताश्री के भाग्य से ही रोटी खाते थे । बेटे अपने पिता के  पास गये और अपनी गलती स्वीकार करली । पिता की आज्ञानुसार वे भी आँवला पेड की पूजा करने लगे । उनके यहाँ पहले जैसी खुशहाली हो गई ।
 
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